गाँधी

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सब जानते हैं कि मोहन चन्द करमचन्द गाँधी से महात्मा गाँधी बनने की दास्तां। बचपन में सबको बापू के पद चिह्नों पर चलने की प्रेरणा दी जाती रही है, लेकिन बहुत ही कम लोग उनके बचपन (लगभग15 वर्ष) तक की उम्र में उनके द्वारा किए गए कुकृत्यों बारे में जानते हैं। हकीकत में बचपन में गाँधी ने बीड़ी, सिगरेट पीने  का चस्का लगा लिया और बड़ों के फेंके गये बीड़ी सिगरेट के टोटों से काम चलाने लगे थे। बाद में बीड़ी सिगरेट खरीदने के लिए अपने नौकर तक के पैसे चोरी करते थे। जिस दिन पैसे की व्यवस्था न हो पाती, वह बीड़ी की तरह धुआँ छोड़नेवाली जलती लडकी से ही तृप्ति करते थे।
     यही नहीं उन्होंने अपने घर से सोने का कड़ा तक चोरी किया और ढूँढ मचने और पूँछताछ होने पर साफ मना कर दिया कि मैंने नहीं चुराया, लेकिन श़क के घेरे में आने पर जब पिता ने छड़ी हाथ में लेकर फिर गुस्से से पूँछा तो मान लिया कि सोने का कड़ा मैंने ही चुराया था। अपनी इन तमाम बुरे कर्मों से दुःखी गाँधी ने आत्महत्या करने का विचार किया और धतूरे के बीज़ भी  ढ़ूँढ लाये, पर अन्त में कुछ सोंचकर उन्होंने मरने का इरादा त्याग कर सही दिशा में चलने का निर्णय लिया। यह सब उन्होंने अपनी आत्मकथा में वर्णन किया है।
 बड़े होकर महात्मा बनने के बाद भी गाँधी ने जो सबसे बडी़ भूल या नाइन्साफी की,वह यह कि अपने ही कर्मठ और खा़स सहयोगी, गुजराती और सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री चुने गये सरदार साहब से। जिस तरह द्रोण ने बेवजह एकलब्य का अँगूठा माँगकर उसका सम्पूर्ण अहित कर दिया, उसी तरह सरदार साहब से प्रधानमंत्री की कुर्सी छींनकर नेहरू को सौंपना, यह सरदार साहब से ही नहीं पूरे देश से  भी अन्याय था, जिसका ख़ामियाजा देश आज भी झेल रहा है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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