चला मुरारी हीरो बनने

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सपने देखना और महत्वकाक्षीं होना गलत नहीं, स्वाभाविक क्रिया है। कहावत है कि अगर व्यक्ति कठिन परिश्रम करता है तो वह सपनों को हकी़कत में भी बदल सकता है, लेकिन अचेतन मनोवस्था में देखे सपने सच हो जायें ऐसा भी नहीं है, यह सिर्फ क्षणिक अनुभव हो सकता है। चेतन अवस्था में देखे सपनें, व्यक्ति को आगे बढ़कर मंजिल पाने को प्रेरित करते है, लेकिन जो लोग सटीक आंकलन और मजबूत इरादों और कठिन परिश्रम के आदी नहीं होते और पाना बहुत कुछ चाहते हैं। ऐसे लोगों के सपने “मुंगेरी लाल के हंसीन सपने” बनकर रह जाते हैं।      

अस्वस्थ चल रहे दलित नेता व केन्द्रीय मंत्री रामबिलास पासवान के बेटे चिराग का हाल भी “मुंगेरी लाल” और “मुरारी” जैसा है। तमन्ना थी कि फिल्मी हीरो बना जाय। एक फिल्म भी बनी, पर पहली फिल्म ही फ्लाप हो गई और चिराग पासवान का फिल्मी चिराग भी बुझ गया। तदोपरान्त बाप के काम को बेटे ने सम्भालने की कोशिश की, जो जारी है। बाप ने अपने मालिकाना ह़क की राज पार्टी का सर्वेसर्वा अपने कम अनुभवी बेटे चिराग पासवान को बना दिया, जो असफल फिल्मी मृगतृष्णा की हताशा में जी रहे थे। रामबिलास पासवान के कथित अस्वस्थताकाल में बिहार में चुनावी बिगुल बज गया, जो चिराग के लिये बहुत बड़ी परीक्षा की घड़ी लेकर आया। अनुभवहीन चिराग के लिये एक कठिन परीक्षा साबित होने वाला है, क्योंकि अति महत्वकांक्षी चिराग ने जहाँ जल्दबाजी में पुराने बडे गठबंधन से दूरी बनाई, वहीं बिहार के सबसे लोकप्रिय नेता और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की बुराई भी करनी शुरू कर दी। इसे कहते हैं कि जिस डाल पर बैठा, उसे ही काटा। वैसे भी अगर नेता का बेटा सफल नेता बनने की गारन्टी होता, तो राहुल गांधी कब के पीएम बन जाते। अकेला चलो रे, चिराग के भाग्य का फैसला तो 11नवम्बर को पता चलेगा, लेकिन यह तय है कि चिराग पासवान की राह बहुत कठिन है। अति आत्मविश्वास और अति महत्वकांक्षा व्यक्ति को हमेशा भारी पड़ती हैं। देखें ये चिराग के मुख्यमंत्री बनने की जल्दी और अनुभवहीनता कहीं चिराग को फिर से ले ना डूबे और लोग कहें कि इस घर को आग लग गई, घर के चिराग से या चला मुरारी हीरो बनने…।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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