धनवान

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक बार दार्शनिक कन्फ्युशियस एकान्त में ध्यान मग्न थे, तभी चीन का सम्राट अपने पूरे सैन्य, सेवक दस्ते के साथ ऊधर से गुज़रा, लेकिन कन्फ्युशियस ने सम्राट पर कोई ध्यान नहीं दिया। दस्तूर था कि सम्राट जिस रास्ते गुज़रता, वहाँ आम ओ ख़ासजन सभी उसके सामने नतमस्तक हो जाते थे,  परन्तु कन्फ्युशियस की धृष्टता देख सम्राट को बहुत क्रोध आया।  वह उसके पास गये और कड़क आवाज में पूछा-कौन हो तुम ?  कन्फ्युशियस ने शान्ति से जवाब दिया-मैं सम्राट हूँ।  सम्राट काे यह सुनते ही और गुस्सा आ गया, लेकिन क्रोध नियंत कर बोला-तुझे दिखता नहीं क्या ? यहाँ का सम्राट मैं हूँ। देख मेरे पास सेना, सेवक, धन-दौलत और मान-सम्मान है,  तेरे पास तो कुछ भी नहीं है। तू कैसा सम्राट है ?
      कन्फ्युशियस ने विनम्रतापूर्वक कहा-सेना तो उसे चाहिये, जिसका कोई शत्रु हो। मेरा कोई शत्रु नहीं है। सेवक, नौकर-चाकर उसे चाहिये, जो आलसी और कामचोर हो। जबकि मैं न तो आलसी और न कामचोर हूँ। अपने सारे कार्य मैं स्वयं करने में सक्षम हू और धन-दौलत की जरूरत उसे होगी, जो गरीब हो। सम्राट ने उसकी बातें सुनकर परिहास में कहा-पर तुम तो सिर्फ गरीब नजर आ रहे हो, कहाँ है तुम्हारी धन-दौलत ?
      तब कन्फ्युशियस ने हँस कर कहा-ये सोना-चांदी हीरे-जवाहरात मेरे लिए सब बेकार हैं, क्योंकि मेरा धन तो संतोष-धन है। अब तुम्हीं बताओ कौन धनवान और सम्राट है।  उनके यह विचार सुनकर सम्राट भी नतमस्तक हो गया।  कहावत है, जब आवे संतोष धन, सब धन धूर समान।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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