क्षेत्रीय भाषा व संस्कृति बचाने को दूसरे दिन वेबिनार के माध्यम से जुड़े कांगड़ा, चम्बा, हमीरपुर तथा ऊना के विद्वान, स्कूल-कालेज स्तर पर प्रयास तेज करने की दिया सुझाव

शि.वा.ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश मे पहाड़ी भाषा की गतिविधियो ंको बढ़ावा देने का जिम्मा सम्भालते हुए हिमाचल के भाषा एवं संस्कृति विभाग ने अपनी कमर कस ली है। विगत प्रदेश के चार जिलों कांगड़ा, चम्बा, हमीरपुर तथा ऊना के पहाड़ी बोली के विद्वानों को बेविनार के माध्यम से सम्बन्धित जिलों की बोलियों की स्थिति पर परिचर्चा करने के बाद आज दूसरे दिन प्रदेश के अन्य चार जिलो ंमण्डी, कुल्लू, किन्नौर तथा लाहौल स्पिति के भाषा जानकारों से बेविनार के माध्यम से मुख्य रूप से वर्ष 1966 के बाद सम्बन्धित जिलों में पहाड़ी भाषा की स्थिति, भौगोलिक दृष्टि से प्रचलन और व्यवहार, सम्बन्धित क्षेत्र के लोगों द्वारा अपनी भाषा व्यवहार में लाने, पहाड़ी भाषा में हुए प्रकाशन की स्थिति तथा युवा पीढ़ी द्वारा अपनी भाषा को व्यवहार में लाने सम्बन्धी परिचर्चा की गई तथा बोली को जीवंत बनाएं रखने के लिए सुझाव प्राप्त किए गए।
हिमाचल के भाषा एवं संस्कृति विभाग की सहायक निदेशक (भाषा) कुसुम संघाईक ने विद्वानों का स्वागत करते हुए पहाड़ी सप्ताह के दौरान आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों की जानकारी दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुल्लू जिला के विद्वान डाॅ0 सूरत ठाकुर ने की। मण्डी से कृष्ण चंद महादेविया ने मण्डी में प्रकाशित साहित्य के बारे में जानकारी देेने के साथ-साथ सुझाव दिया कि विभाग व अकादमी द्वारा स्कूलो, महाविद्यालयो तथा विश्वविद्यालयों में कम से कम वर्ष में तीन बार क्षेत्रीय भाषा से सम्बन्धित कार्यशाला तथा पहाड़ी भाषा से सम्बन्धित अन्य कार्यक्रम करवायें जाये, ताकि इसे अधिक से अधिक व्यवहारिक बनाया जा सके। मण्डी से डाॅ0 राकेश कपूर ने कहा कि भाषा केवल शब्दों का समूह मात्र नहीं है, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध संस्कृति से है, इसलिए भाषा में जो अपभं्रश हो रहा है, उसे रोका जाना चाहिए। उस पर चिंतन की आवश्यकता है, ताकि क्षेत्रीय भाषा का अस्तित्व बना रहे। कुल्लू से दीपक शर्मा ने कहा कि हमें घरों में अधिक से अधिक लोकभाषा बिना संकोच के बोलनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पाठयक्रम में लोकगीत, लोकभाषा अवश्य होनी चाहिए तथा विद्यालयों में सप्ताह में एक दिन लोकभाषा दिवस मनाया जाना चाहिए। लाहौल स्पिति से सतीश लोपा ने सुभाव दिया कि लोकभाषा के लिए जागरूकता अभियान तथा स्कूलों में प्रतियोगिता करवाई जानी चाहिए ताकि स्कूली स्तर से लोकभाषा प्रयोग में लाई जाये। किन्नौर ने डाॅ0 विद्यासागर ने किन्नौरी भाषा को संरक्षित करने हेतु विभाग तथा अकादमी स्तर पर व्याकरण तथा शब्दकोष तैयार करने का सुझाव दिया ताकि आने वाली पीढ़ी लोकभाषा का प्रयोग करे। किन्नौर के नरेन्द्र नेगी ने कहा कि युवाओं को यदि प्रोत्साहन दिया जाये तथा विभिन्न अवसरों पर मंच प्रदान किया जाये तो वे लोकभाषा पर कार्य करेगें। कार्यक्रम के अध्यक्ष डाॅ0 सुरत ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जब तक माता-पिता लोकभाषा में पहल नहीं करते तब तक सरकार या बाहरी व्यक्ति भाषा को नहीं बचा सकता। इस भाषा को जनमानस को ही बचाना होगा। कुल्लू के मलाणा गाॅवों में कणाशी बोली का अधिक से अधिक प्रयोग होता है। उसी प्रकार हमें इसकी पहल अपने आप से करनी होगी। डाॅ0 सूरत ठाकुर ने कहा कि शोध कार्य के साथ-साथ गाॅव-गाॅव जाकर इसका प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है। सभी विद्वानों ने लेखकों द्वारा लिखे जाने वाले पहाड़ी साहित्य को प्रकाशित करवाने हेतु विभाग तथा अकादमी को नई पत्रिका शुरू करवाने का सुझाव दिया तथा पहाड़ी में साहित्य के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता प्रदान करने का सुझाव दिया।
विभाग के निदेशक अनुपम कश्यप ने बताया कि विभाग द्वारा जिला तथा राज्य स्तर पर इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, ताकि हर जिले की क्षेत्रीय बोलियों को प्रोत्साहन दिया जा सके।

 

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