क्षेत्रीय पहाड़ी भाषाओं के संरक्षण में जुटा हिमाचल का भाषा एवं संस्कृति विभाग, पहाड़ी दिवस 1 नवम्बर को

शि.वा.ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश मे पहाड़ी भाषा की गतिविधियो को बढ़ावा देने का जिम्मा सम्भालते हुए हिमाचल के भाषा एवं संस्कृति विभाग ने गत वर्षो की तरह 1 नवम्बर को पहाड़ी दिवस का आयोजित करने के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं।
भाषा एवं संस्कृति विभाग के सहायक निदेशक कुसुम संघाईक के अनुसार पहाड़ी भाषा को प्रोत्साहन देने हेतु विभाग गत दो वर्षों से विभाग द्वारा पहाड़ी सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम विभाग द्वारा आज प्रदेश के चार जिलों कांगड़ा, चम्बा, हमीरपुर तथा ऊना के पहाड़ी बोली के विद्वानों को बेविनार के माध्यम से सम्बन्धित जिलों की बोलियों की स्थिति पर परिचर्चा की गई, जिसमें मुख्य रूप से वर्ष 1966 के बाद सम्बन्धित जिलों में पहाड़ी भाषा की स्थिति, भौगोलिक दृष्टि से प्रचलन और व्यवहार ,सम्बन्धित क्षेत्र के लोगों द्वारा अपनी भाषा व्यवहार में लाने, पहाड़ी भाषा में हुए प्रकाशन की स्थिति तथा युवा पीढ़ी द्वारा अपनी भाषा को व्यवहार में लाने सम्बन्धी परिचर्चा की गई तथा बोली को जीवंत बनाएं रखने के लिए सुझाव प्राप्त किए गए। विभाग के उप निदेशक प्रेम प्रसाद पंडित ने कार्यक्रम में विद्वानों का स्वागत किया तथा पहाड़ी सप्ताह के दौरान आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों की जानकारी दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता डाॅ0 प्रत्युष गुलेरी ने की। कार्यक्रम का मंच संचालन विभाग की सहायक निदेशक कुसुम संघाईक ने किया।


कांगड़ा से डाॅ0 गौतम व्यथित ने कांगडी में प्रकाशित साहित्य में जानकारी के साथ-साथ सुझाव दिया कि विभाग व अकादमी द्वारा पहाड़ी में आयोजित कार्यक्रमों को स्कूलो, महाविद्यालयो तथा विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय भाषा में करवाया जाये, जिससे युवा पीढ़ी में अपनी बोली से जुड़े रहें। हमीरपुर से पूर्व प्रशासनिक अधिकारी केआर भारती, अजीत दीवान, चम्बा से पूर्व प्रशासनिक अधिकारी प्रभात शर्मा, अशोक दर्द, ऊना से देसराज मोदगिल, कांगड़ा से त्रिलोक सूर्यवंशी ने इसी बात पर बल दिया कि पहाड़ी भाषा में अधिक से अधिक साहित्य का सृजन किया जाए, जिससे अपनी क्षेत्रीय बोलियों का संरक्षण हो सके। श्रीप्रभात शर्मा में पंगवाली बोली के संरक्षण पर बल दिया। उन्होने कहा कि पंगवाली बोली के संरक्षण के लिए वहाॅ के साहित्य को जीवंत रखना होगा, जिसके लिए विभाग पांगी के साहित्यकारों को मंच प्रदान करने का प्रयास करनें तथा पंगवाली साहित्य का प्रकाशन करवानें का भी सुझाव दिया। सभी विद्वानों ने लेखकों द्वारा लिखे जाने वाले पहाड़ी साहित्य को प्रकाशित करवाने हेतु विभाग तथा अकादमी को नई पत्रिका शुरू करवाने का सुझाव दिया। हमीरपुर से केआर भारती ने नई शिक्षा नीति में प्राईमरी में क्षेत्रीय भाषा आरम्भ करने के प्रयास को सराहनीय कदम बताया। कार्यक्रम के अध्यक्ष डाॅ0 प्रत्युष गुलेरी ने क्षेत्रीय बोलियों को हिमाचली बोली सम्बोधित करनेे पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपने क्षेत्र की बोली को बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए, बल्कि निसंकोच बोलते रहना चाहिए, तभी पहाड़ी बोली का विकास सम्भव हो सकता है। विभाग के अतिरिक्त निदेशक डाॅ0 विकास सूद ने बताया कि विभाग द्वारा जिला तथा राज्य स्तर पर इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, ताकि हर जिले की क्षेत्रीय बोलियों को प्रोत्साहन दिया जा सके।

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