शिवपुराण से……. (263) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सृष्टि का वर्णन……………..

पंचमुख महादेव ने केवल अपने रहने के लिए सुरम्य कैलाश नगर का निर्माण किया, जो सब लोकों से ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड़ का नाश हो जाने पर भी वैकुण्ठ और कैलास-इन दो धामों का यहां कभी नाश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोक का आश्रय लेकर रहता हूं। तात! महादेव जी की आज्ञा से ही मुझमें सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न हुई है। बेटा! जब मैं सृष्टि की इच्छा से चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझे अनजान में ही पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टि का प्रार्दुभाव हुआ, जिसे अविद्या-पंचक (अथवा पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं। तदन्तर प्रसन्नचित्त होकर शम्भू की आज्ञा से मैं पुनः अनासक्त भाव से सृष्टि का चिन्तन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर-संज्ञक वृक्ष आदि की सृष्टि हुई, जिसे मुख्य सर्ग कहते हैं। (यह पहला सर्ग है।) उसे देखकर तथा वह अपने लिए पुरूषार्थ का साधक नहीं है, यह जानकर सृष्टि की इच्छा वाले मुझ ब्रह्मा से दूसरा सर्ग प्रकट हुआ, जो दुख से भरा हुआ है, उसका नाम है-तिर्यक्स्त्रोता (पशु, पक्षी आदि तिर्यक्स्त्रोता कहलाते हैं। वायु की भांति तिरछा चलने के कारण ये तिर्यक् अथवा तिर्यक्स्त्रोता कहे गये हैं।)। वह सर्ग भी पुरूषार्थ का साधक नहीं था। उसे भी पुरूषार्थ साधन की शक्ति से रहित जान जब मैं पुनः सृष्टि का चिन्तन करने लगा, जब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्विक सर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे ऊध्र्वस्त्रोता कहते हैं। यह देवसर्ग के नाम से विख्यात् हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरूषार्थसाधन की रूचि एवं अधिकार से रहित मानकर मैंने अन्य सर्ग के लिए अपने स्वामी श्रीशिव का चिन्तन आरम्भ किया।

(शेष आगामी अंक में)

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