प्रो. श्रावण देवरे का बहुजननामा 126 उचाट आंदोलन

विद्यार्थी जीवन में ही आंदोलन से जुड़ा, 1978 से 80 के दरम्यान सकप के आंदोलन उसके बाद एक वर्ष दलित पैंथर के साथ काम किया। तुम ओबीसी हो तो तेली, माली, धनगर समाज में काम करो, यहां दलित आदिवासी आंदोलन में ऊर्जा क्यों खर्च कर रहे हो? ऐसी सलाह मिलने के बाद ओबीसी आंदोलन की तरफ मुड़ा। 1981 का साल बीता आपातकाल के ऐतिहासिक पराभव के बाद इंदिरा गांधी फिर से प्रंचड बहुमत से प्रधानमंत्री बनीं। मंडल कमीशन की रिपोर्ट पार्लियामेंट में चर्चा में आई देश भर में वातावरण गरम हुआ, फुले साहू अम्बेडकर की धरती महाराष्ट्र में इस संघर्ष की धार तेज हुई।
ओबीसी आंदोलन में काम शुरू किया और पहला ही सामना मराठा समाज से हुआ। मंडल कमीशन का विरोध करने की पृष्ठभूमि पर महाराष्ट्र में मराठा महासंघ नाम के संगठन की स्थापना हाल ही में की गई थी। माथाडी कामगारों के एक वर्गीय नेता को जाति का नेता बनाकर उसे मंडल आयोग का विरोध करने के काम पर लगाना यह षड्यंत्र संघ-भाजपा का था, उसमें मराठा सत्ताधारियों का छुपा राजनीतिक एजेंडा भी था।
मराठा महासंघ ने पूरे राज्य में मंडल आयोग के विरोध में सभाएं आयोजित करने का अभियान चलाया। मंडल आयोग के समर्थन के लिए श्रमिक संगठन के प्रमुख नेता कुमार शिरापळकर पत्रक छापकर लाये थे। मैं हाल ही में आंदोलन में शामिल हुआ विद्यार्थी कार्यकर्ता था, इन पत्रकों को मराठाओं की सभा में बांटने के काम पर हमें लगाया गया। इस आग लगाने वाली सभा के हिंसक वातावरण में हम लोगों ने जान जोखिम में डालकर हैंडबिल बांटे।
सभा के अध्यक्ष दैनिक आपला महाराष्ट्र के संपादक भाई मदाने थे। सभा में मुख्य भाषण अण्णा पाटिल का हुआ। अण्णा पाटिल ने अपने भाषण में मंडल आयोग पर जोरदार प्रहार किया। उन्होंने कहा कि मंडल आयोग मतलब बंडल आयोग खबरदार! यदि ओबीसियों को आरक्षित जगह दिया तो महाराष्ट्र जल उठेगा,अण्णा पाटिल का वह भाषण आज भी कान में प्रतिध्वनित स्वरूप में घूमते रहता है। अण्णा पाटिल का आग लगाने वाला हिंसक भाषण समाप्त होने के बाद समापन भाषण करने के लिए अध्यक्ष के रूप में भाई मदाने खड़े हुए और अक्षरशः अण्णा पाटिल के भाषण का चिंदी चिंदी कर दिए, तुम्हारा दिमाग ठिकाने पर है क्या? अण्णा पाटिल से ऐसा सवाल करते हुए भाई मदाने के भाषण की शुरुआत हुई।
उसके बाद मैं जनार्दन पाटिल के संपर्क में आया। शरद पाटिल के माध्यम से मेरी जाति का पता लगाकर मुझे सीधे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन का उपाध्यक्ष घोषित कर दिया। सत्यशोधक कम्युनिस्ट पक्ष का मैं (आफ द रिकार्ड) सदस्य होने के कारण पार्टी की तरफ से मेरी नियुक्ति ओबीसी संगठन में हुई, कर्मवीर जनार्दन पाटिल के साथ अनेकों कार्यक्रम यशस्वी होने के बाद प्रतिभा देखकर मेरे ऊपर ओबीसी महाग्रंथ लिखने की जिम्मेदारी सौंपी। एडवोकेट माधवराव वाघ की आर्थिक मदद से साकार हुए इस महाग्रंथ की प्राच्यविद्यापंडित काॅ शरद पाटिल ने प्रस्तावना लिखी। उन्होंने प्रस्तावना में ग्रंथ को सिर्फ ओबीसी आंदोलन के लिए ही नहीं, बल्कि जातिअंतक आंदोलन के मार्गदर्शक के रूप में गौरवान्वित किया है।
इस ग्रंथ के नाम से ही जाति अंतक प्रबोधन शुरू होता है मंडल आयोग ओबीसी वर्ग का लोकशाही मुक्ति का घोषणापत्र यही वह ग्रंथ है। उस समय ओबीसी आंदोलन के जाति अंतक तत्वज्ञान की कसौटी पर विश्लेषण करनेवाला यह एकमेव ग्रंथ था। इस ग्रंथ का प्रकाशन दिल्ली में हुए (1989) एनयूबीसी के महाअधिवेशन में तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान के हाथों हुआ। 5 महीने में ही पांच हजार प्रतियां बिक गईं। इस ग्रंथ ने महाराष्ट्र भर में ओबीसी संगठन का जाल बुनने में बड़ी मदद की।
इसी दौरान मैंने कालेज के विद्यार्थियों को साथ लेकर सत्यशोधक विद्यार्थी संघटना की स्थापना की। तब तक मंडल आयोग का ओबीसी आंदोलन सिर्फ सामाजिक- राजनीतिक स्तर पर ही था, उस आंदोलन को हमलोग विद्यार्थी वर्ग तक ले गए। 1990-91 के समय में शेतकरी कामगार पक्ष के नेता दिबा पाटिल की अध्यक्षता में सर्वपक्षीय आरक्षित जगह संरक्षण समिति की स्थापना हुई, इस समिति का मैं सदस्य था। अनेक बार इस समिति की बैठक किसान संगठन के विधायक मोरेश्वर टेंभुर्डे के मुंबई स्थित विधायक निवास में होती रहती थी, इस समिति की कुछ महत्वपूर्ण बैठकों व आंदोलनों का वृत्तांत मैंने मेरी मंडल आयोग व आधुनिक पेशवाई पुस्तक में छापा है। इन बैठकों में रिपब्लिकन पार्टी के रासु गवई, शेकाप के विधायक दत्ता पाटिल, भाई बंदरकर, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के लस कारखानीस, एडवोकेट जनार्दन पाटिल आदि दिग्गज लोग जरूर उपस्थित रहते थे। मंडल आयोग आंदोलन सरकारी कर्मचारी अधिकारी वर्ग में भी पहुंचना चाहिए इस उद्देश्य से प्रदीप ढोबले के साथ ओबीसी सेवा संघ की स्थापना की। राज्य में सर्वत्र कर्मचारियों का अधिवेशन लेकर प्रबोधन का आंदोलन खड़ा किया।
ओबीसी आंदोलन सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर रहकर ही चलने वाला नहीं है, बल्कि उसका सैद्धांतिक पाया मजबूत करने के लिए उसे सांस्कृतिक स्तर पर ले जाना होगा, इसके लिए हमने तत्कालीन विधायक सुधाकर राव गणगणे की मदद से अखिल भारतीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन आयोजित करने की शुरुआत की। मराठा समाज को झूठे व गलत रास्ते से एसईबीसी का दर्जा देकर आरक्षण देना यानी उनका ओबीसी करण करना ही है। ऐसे ओबीसीकरण का विरोध करने के लिए प्रकाश अण्णा शेंडगे, बालाजी शिंदे, खरमाटे आदि को साथ लेकर ओबीसी व्हीजेएनटी संघर्ष समिति की स्थापना की। मैं किसी किसी भी एक संगठन में अटककर पड़ा नहीं रहा, संगठन निर्माण किया उसे खड़ा किया और कुछ समय के बाद सक्षम लोगों को सौंपकर अगले टप्पे के काम में लग गया।
आंदोलन में संगठनात्मक जनांदोलनों का जितना महत्व होता है, उतना ही महत्व आंदोलन के वैचारिक मार्गदर्शन का भी होता है। तात्यासाहेब ज्योतिबा फुले ने स्त्रियों व अछूतों के लिए स्कूल खोले, विधवाश्रम, अकाल व प्लेग निवारण, सत्य शोधक समाज, किसान व मजदूर संगठन आदि काम किया, किन्तु उन सबके साथ ही उन्होंने ग्रंथ संपदा निर्माण पर भी जोर दिया। इस तरह जाति अंतक तत्वज्ञान के निर्माण की मजबूत आधार शिला रखी।
डा. बाबा साहेब आंबेडकर ने अपने जीवन में सिर्फ दो ही महान आंदोलन किए। एक महाड का चवदार तालाब का महासंगर और दूसरा काळाराम मंदिर का सत्याग्रह। किन्तु उन्होंने जाति अंतक आंदोलन को युगों युगों तक मार्गदर्शन करने वाले ग्रंथों का पहाड़ ही निर्मित कर दिया। यही 100-150 वर्ष पहले लिखे गए ग्रंथ पढ़कर हम सब आज का आंदोलन चला रहे हैं। मंडल आयोग आंदोलन को जाति अंतक दिशा मिले, इसके लिए हमने सैकड़ों लेख, दर्जनों पुस्तकें लिखकर अपने पैसे खर्च करके छपवाया और बेचा। वैचारिक परिसंवाद, व्याख्यानमाला, साहित्य सम्मेलन, अधिवेशन, स्पर्धापरीक्षा, तत्वज्ञान विद्यापीठ आदि के माध्यम से निरंतर प्रबोधन का काम किया। केवल ओबीसी ही नहीं, बल्कि आदिवासी, दलित, मराठा आदि समाज घटकों के बीच सर्वाधिक व्याख्यान (बिना मानधन) देने का कीर्तिमान हमने ही बनाया है। जिस किसी को यह सब जांचना हो, वह हमारे घर में रखे 20-25 बाक्स में रखी फाइलें देख लें, जिनमें से 4-5 फाइलें कार्यक्रम पत्रिका से ही भरी मिलेंगी। आज तक सैकड़ों लेख लिखे दर्जनों पुस्तकें लिखी, परंतु अनेक लोगों के आग्रह के बावजूद कभी अपने ऊपर कुछ नहीं लिखा। यह पहला लेख होगा जिसमें मुझे अपने बारे में लिखना पड़ रहा है।
हमारे ओबीसी आंदोलन में जो थोड़े बहुत लोग हवसे, नवशे-गवशे घुसे हुए हैं वे अध्ययन के शत्रु हैं, वे पुस्तकों के शत्रु हैं और वाचन के भी शत्रु हैं। कुल मिलाकर वे विचार के शत्रु हैं, उनका अज्ञान दूर करने के लिए मुझे यह सब लिखना पड़ रहा है।
एक समय ऐसा था कि महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से सर्वत्र कुनबी विधायक ही चुनकर आते थे। आगरी समाज के विधायक व मंत्री होते थे, परंतु हाल के दिनों में इस जाति के बावकर-तांडेल जैसे नेताओं के वाचन-शत्रु व विचार-शत्रु होने के कारण इन दोनों जातियों को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से प्रभावहीन कर डाला। वास्तव में ये दोनों जातियां मंत्रालय से सबसे नजदीक के क्षेत्र में रहती हैं। 3 घंटे में तीन लाख का घेराव मंत्रालय का करने की ताकत इन समाजों में है, परंतु नेता यदि हवसे-नवशे-गवशे जैसे होंगे तो कुछ भी नहीं हो सकता। कभी-कभी 2-3 हजार लोगों की भीड़ आजाद मैदान पर जमा करना, भीड़ के सामने अपना नेतृत्व सिद्ध करना और हाथ हिलाते हुए निकल जाना, अपनी जाति को ओबीसी आंदोलन से जोड़ना, इन्हें कभी जमा ही नहीं। जब विचार में ही नहीं है तो कृतित्व में कैसे आयेगा। जो विचार देते हैं उनसे ये दूर ही रहते हैं। हाईकोर्ट में मराठा आरक्षण विरोधी पिटीशन तैयार करने के लिए मैंने इन्हें दो वैचारिक तरुण दिए थे, प्रो. शंकर महाजन व कमलाकर ये मेरे ही कार्यकर्ता हैं।
पिटीशन तैयार होने के बाद श्रेय लेने के लिए इन दोनों वैचारिक तरुणों को भगा दिया गया। आगरी समाज किसान प्रबोधिनी के संस्थापक रहे राजाराम पाटिल का निरीक्षण ऐसा है कि इन नेताओं ने आगरी व कुनबी समाज में कभी भी वैचारिकी देने का प्रयास ही नहीं किया। फिलहाल अभी माधव कांबले जैसे तरुण-कुनबी वैचारिक प्रबोधन का भरपूर प्रयास कर रहे हैं, यह अत्यंत आनंद की बात है। ओबीसी आंदोलन की शिक्षा हमने जनार्दन पाटिल, दिबा पाटिल जैसे दिग्गज आगरी व कुनबी नेताओं से ली। वह शिक्षा लेकर हमने महाराष्ट्र के माली, तेली, धनगर, बलूतेदार जातियों में ओबीसी के रूप में काम किया। फलस्वरूप आज इन जातियों में विधायक सांसद व मंत्री दिख रहे हैं। शिक्षण संस्थान व अन्य मूलभूत काम दिखाई पड़ रहे हैं।

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