बुद्धिमान

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक जंगल में सैला, साँप और सियार तीन मित्र रहते थे। एक बार बातों बातों में चर्चा छिड़ी कि उनमें से बुद्धिमान कौन है ? जहाँ बुद्धिमत्ता का प्रश्न आता है, वहाँ कौन पीछे रहनेवाला है?  साँप ने कहा-मैं सौ तरह की बुद्धियाँ जानता हूँ। सैला बोला-मैं पच्चास तरह की बुद्धिया जानता हूँ। अन्त में सियार बोला-भाई मुझमें सौ पच्चास नहीं सिर्फ एक बुद्धि है।   जब समस्या आती है तो उसी से काम लेता हूँ। अपनी अपनी अकड़ में सांप और सैला ने कहा-बस और बात आई, गई हो गई।
  कुछ दिन बाद ही अचानक जंगल में आग लग गई और सारे जंगल में फैलने लगी। सांप आग से बचकर निकल न सका, सैले का भी भागना कठिन था, कांटों का भार लेकर दौड़ना कहाँ सम्भव है। दोनों थोड़ी देर में आग में जलकर मर गये, परन्तु सियार बहुत तेजी से दौड़ा और बगै़र पीछे देखे दौड़ता ही चला गया। जंगल समाप्त होने पर उसने खुलें मैदान में जाकर ही साँस ली।
वह जंगल की भभकती आग आग को देखकर बोल उठा-जिसमें सौ बुद्धियां थी वह जली हुई रस्सी जैसा पड़ा है। जिसमें पच्चास बुद्धियां थी, वह वह गेंद जैसा गोल बन गया है। इनसे तो मेरी अकेली बुद्धि ही अच्छी है, जिससे मैं सकुशल जीवित खडा़ हूँ। बुद्धि एक ही होने पर भी उसका सही और सकरात्मक उपयोग करना चाहिए। जो सांप और सैला ने प्रयोग नहीं की। क्योंकि सांप ने अपने बिल में और सैला ने अपने पत्थरों के बीच गुफा में शरण नहीं ली। जहाँ शायद बच भी सकते थे।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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