अपराजित जंगी

मनमोहन शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हम डरे
हम रूके
घर के अंदर
हम छुपे
वो भी रहा ताक में
जकड़ने की फिराक में
कब कोई बाहर निकलें
पाँव फिसले
वो ले सके आगोश में
ताकि फिर न आएं
हम कभी होश में
मगर हम भी थे होशियार
करते रहे खबरदार
ताली, घंटी,शंख बजाए
बुर्का पहना, खूब नहाए
भ्रमण का विरोध किया
घूमता जो भी मिला
उसी का संगरोध किया
ज्यों ही हमारी ढीली हुई
पकड़
बढ़ाता गया वो अपनी जकड़
रूका कहाँ वो दम घुटने तक
झुकते गए हम टेक घुटने तक
अपराजित सा वो ऐसा जंगी बना
कफन से दफन तक का
वही संगी बना
श्मशान की जलती आग में
मजबूरन अब सभी रोटियां सेंकते है
जिधर भी दौड़ाएं नजर
हर तरफ उसी को देखते हैं
परदेस से लाकर घर घर
अब वही चिठ्ठियां बाँटता है
उसे ऐसा हुआ खुमार
शादी हो या त्योहार
बाहों का डाल गले में हार
ढोल ढमाकों के बीच
अब वो हमारे साथ ही नाचता है।
कुसुम्पटी शिमला-9, हिमाचल प्रदेश

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