ज़रूरी और ज़रूरी नहीं

प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

ये ज़रूरी नहीं कि
एक समूह में सारे नास्तिक हो जाएं
ईश्वर को बोलें
“मर गया है “
जैसा नीत्शे ने कहा था
या सारी स्थापनाएं पलट दें
जैसे हीगल को पलटा था, मार्क्स ने
ज़रूरी नहीं है
जब कोई त्यौहार मनाए
तो हम उन्हें एहसास दिलाएं
 त्यौहार कुछ नहीं
अंधविश्वास में विश्वास है
हाँ ,यह ज़रूर है
त्यौहार या पर्व के बहाने
धन और भावनाओं का व्यापार न हो
दास और स्वामी का व्यवहार न हो
यह भी उतना ही ग़लत होता है
जब भगवान के नाम पर
आस्तिक ,नास्तिक को गालियाँ देता है
समाज से बहिष्कृत करता है
धर्म, शास्त्र के तर्कों से बार -बार तिरस्कृत करता है
ज़रूरी नहीं
अल्लाह को मानने वाले
औरों को काफ़िर कहें
और भगवान वाले लोग
अल्लाह वालों को म्लेच्छ कहें
कुछ आस्थाएं होती हैं ,तो होती हैं
उनका कोई नहीं होता वैज्ञानिक आधार
किंतु अंधास्था भी नहीं होती आस्था का एक प्रकार
 जैसे उत्तरपूर्व का आदिवासी समाज, सूर्य को माता कहता है
तो गाँव का किसान ,मजदूर सूर्य को जल चढ़ाता है
जो आस्था प्रकृति के लिए है
इंसानियत के लिए
आवश्यक है उसका होना
चाहे उसका कोई वैज्ञानिक आधार हो या न हो
हर तरह की अतिवादिता
पैदा करती है हठधर्मिता
मानसिक उन्मादता
सिर काटने की लालसा
कट्टरता और आत्म मुग्धता
वो चाहे तार्किक अतिवादिता हो
या धार्मिक अतिवादिता
एक अच्छा स्वस्थ्य समाज  होता है
एक गुलशन जैसे
जिसमें
अलग- अलग विचार और मान्यताओं के फूल महकते हैं
नीले, पीले, काले ,उजले पौधे उगते हैं
एक साथ अस्तित्व में रहते हैं
जैसे एक खेत में
जिसमें कभी अरहर पायल पहनकर करती है छमछम
तो कभी गेहूँ बजाता है ढोलक ढमढम
और कभी चना सर पे गमछा बाँधे खड़ा रहता है
तो कभी धान पानी में पड़ा रहता है
खेत कभी मना नहीं करता कि
वह सिर्फ़ सरसों के फूलों को ही प्यार करेगा
या चने के दाने से  ही दुलार करेगा
जिस दिन खेत ऐसा करने लगेगा
वह बंजर हो जाएगा
बहुत भयानक मंज़र हो जाएगा
हाँ ,यह ज़रूरी है
एक परिवार या समाज के भीतर सुरक्षित रहे हर एक व्यक्ति
साथ साथ रह सकें दो भाई
चाहे एक हो  बौद्ध ,और दूसरा ईसाई
आस्तिक या नास्तिक
शाकाहारी या मांसाहारी
एक तर्कशील और दूसरा आस्थावान
बस इतना ज़रूरी है
सब एक दूसरे की सही स्थापनाओं का करें सम्मान।
शोधार्थी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी इलाहाबाद

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