आईना

https://shikshavahini.com/wp-content/uploads/2021/07/m.jpg

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

है आईना अकेला..
चेहरे बदल रहे हैं”
आंधियों के कारवाँ संग”
कुछ दीप जल रहे हैं।
बाजार में खरीदा बेंचा गया है जीवन”
किसी ने कभी क्या देखा??
वक्त के पांव चल रहे हैं।
अंबर नहीं है मौन”
न दृष्टिहीन हैं दिशायें!
बुढापे के कस्तियों में
कभी खेलता था बचपन।
हिमालय लगा था बौना!
सागर दिखा खिलौना”
जब झूम कर इस बूत पे
कभी फिदा हुआ था यौवन।
जीवन है एक दरिया”
बहता रहा सभी में..
सब लग रहे थे अपना
इस खुद के अजनबी से”।।
मझवार, चन्दौली

Related posts

Leave a Comment