एक माननीय की असुरक्षा

हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

यूं तो राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लेकिन यह भी आठवें अजूबे की तरह ही है कि हमेशा पार्टी के सिद्धांतों के साथ चिपक रहने का दावा करने वाले कुछ माननीय पल्ला झाड़ते ही त्यागी हुई पार्टी के नेताओं और उसकी नीतियों को पानी पी-पीकर कोसने लगते हैं। प्रदेश की राजनीति में भाजपा का चमकता सितारा बनकर उभरे कल्याण सिंह या जनपद की अनुराधा चौधरी को अभी लोग भूले नहीं होंगे। कहते हैं कि राजनीति जीवन में सफलता का सबसे बड़ा शार्टकट है। कल तक जो सड़क पर जुतियां चटकाटा फिरता था, चुनाव जीतने या चुनाव लड़े ही नेताजी की नजर में चढ़ने मात्र से ही आज रूतबा बघारते नहीं थकता है। क्या पता आपके आस-पास का ही कोई मामूली कल चुनाव जीतकर या केवल नेताजी की निगाह का तारा बनकर सत्ता के शिखर पर बैठा नजर आये। कहते हैं कि राजनीति सफलता का जितना बड़ा शार्टकट मानी जाती है, उसमें असुरक्षा भी उतनी ही अधिक है। कितने ही लोग माननीय बनने की आस में अपना सबकुछ दांव पर लगा चुके हैं।
अभी बीते दिनों एक मामूली सी लगने वाली बात हुई। जनपद के एक माननीय ने जनपद निवासी एक बाॅलीवुड स्टार से मुलाकात की। बता दें कि ये बाॅलीवुड स्टार अपने पारिवारिक कारणों व लाॅकडाउन के चलते इर्दगिर्द ही हैं। बात मामूली है, लेकिन जानकारों ने इसमें भी बड़ा मतलब तलाश ही लिया। जानकारों की मानें तो उक्त बालीवुड स्टार सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के चहेते माने जाते हैं। राजनीति के पंड़ित इसमें निहितार्थ मतलब यह निकाल रहे हैं कि उक्त माननीय को पार्टी से टिकट कटने की असुरक्षा अभी से परेशान करने लगी है। राजनीति के पंडितों का मानना है कि ये माननीय दोनों नाव पर सवार रहना चाहते हैं, ताकी अगर अपनी पार्टी से मनवांछित फल नहीं मिले तो दूसरी से कुछ आस बंधी रहे। हालांकि सयाने बताते हैं कि दो नावों में सवारी करने वाले अक्सर डूब जाते हैं।
अब राजनीति के जानकारों पर कोई क्या लगाम कसेगा, लेकिन सयाने कहते हैं कि बात निकली है तो दूर तक जायेगी और वैसे भी बिना आग के धुंआ कैसे हो सकता है। मतलब धुंआ है तो आग भी कहीं न कही अवश्य ही लगी होगी।

खतौली (मुजफ्फरनगर) उत्तर प्रदेश।

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