शिवपुराण से……. (262) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सृष्टि का वर्णन……………..

बारह वर्षों तक भगवान् विष्णु के चिन्तन में लगा रहा। तात! वह समय पूर्ण होने पर भगवान् श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेम से मेरे अंगों का स्पर्श करते हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।
श्रीविष्णु ने कहा-ब्रह्मन! तुम वर मांगो। मैं प्रसन्न हूं। मुझे तुम्हारे लिए कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान् शिव की कृपा से मैं सब कुछ देने में समर्थ हूं।
ब्रह्मा बोले-(अर्थात मैंने कहा-) महाभाग! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है, क्योंकि भगवान् शंकर ने मुझे आपके हाथों में सौंप दिया है। विष्णो! आपको नमस्कार है। आज मैं आपसे जो कुछ मांगता हूं, उसे दीजिये। प्रभो! यह विराट् रूप चौबीस तत्वों से बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, जडीभूत दिखायी देता है। हरे! इस समय भगवान् शिव की कृपा से आप यहां प्रकट हुए हैं। अतः शंकर की सृष्टि-शक्ति या विभूति से प्राप्त हुए इस अण्ड में चेतनता लाइये।
मेरे ऐसा कहने पर शिव की आज्ञा में तत्पर रहने वाले महाविष्णु ने अनन्तरूप का आश्रय ले उस अण्ड में प्रवेश किया। उस समय उन परमपुरूष के सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे। उन्होंने भूमि को सब ओर से घेर कर उस अण्ड को व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भलीभांति स्तुति की जाने पर जब श्रीविष्णु ने उस अण्ड में प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्वों का विकाररूप अण्ड चेतन हो गया। पाताल से लेकर सत्यलोक तक की अवधि वाले उस अण्ड के रूप में वहां साक्षात् श्रीहरि ही विराजने लगे। उस विराट् अण्ड में व्यापक होने से ही वे प्रभु वैराज पुरूष कहलाये। (शेष आगामी अंक में)

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