हिमवाणी संस्था ने शुरू की हिमाचली भाषा में साहित्यकार श्रृखला

उमा ठाकुर, शिमला। हिमवाणी संस्था ने हिमाचली भाषा व  लोक साहित्य को बढ़ावा देने के लिए हिमाचली भाषा में हाल ही में साहित्यकार श्रृखला  शुरु की है, जिसके तहत  आप पहाड़ी बोली में किसी भी विधा में स्वरचित (कविता,कहानी, या लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए लेख) टाइप करके “हिमवाणीे लोक संस्कृति एवं साहित्य सृजन मंच फेसबुक पेज” पर अपलोड कर सकते हैं।

इस श्रृंखला के अंतर्गत चौथी कड़ी में प्रस्तुत है वरिष्ठ साहित्यकार धर्मपाल भारद्वाज कोटगढ़, ज़िला शिमला  द्वारा रचित पहाड़ी रचना महासुवी बोली में शीर्षक “कोटगढ़ो स्लूकौ ” –

हिमाच़ौला दि नाउं मशूर आ कोटगढ़ो।
पूछ़ो किलै? एक हि ज़्वाब आ लोगा काऐ – सेउ लै। 
हिन्दुस्ताना दि सौभी का पहलै सेउ हुऐ कोटगढ़ा दि।
पर सेउ हुऐ तै अंग्रेज़े ज़माने दि।
सैम्युअल स्टोकै लाइ ति पैहलि पौध।
पर एथा का पहलै बि इंदि कुछ् तौ।
जौ तेउ ज़मानिये गौल् आ ज़ेबि लोग भेड़ बाकरी पाड़ा तै।
ऊन गाड़ा तै, ताकली  काता तै।
ऊनो कापड़ौ बणावा तै। 
मेरै आपि देखौनु। घौरा दि सैंणैं ठौगड़ै सिवणिं का आपि सैंवा तै सूतण कुर्तौ।
स्लूकौ सैंउंदै नैंईं  देखो मैं घौरकै।
तेथा लै तै दौर्ज़ि।
जौ मूलै नैंईं पौतौ कि तीना काई सलाईये मशीन हौआ ति कि नैंईं?
कि सिवणि का सैंआ तै ?
पर स्लूकौ शान तौ पूरै इलाकिये।
कै च़ीज़ तौ स्लूकौ बि!
दुइ गूजै  भीतरी त चौन् गूजै बाहरी।
हौद् तौ, गाशुओ गूजौ, ज़ुण पेन पेंसिला लै हौआ, स बि हौआ तौ।
तेबि त लोग पौढ़नु लिखणु बि नैंईं ज़ाणदै तै।
एउ गाशिये गुजिये तरक्कियो रास्तौ खोलौ।
कुदरतै बि साथ् दीणौ।
हिमाच़ौलो पहलो अंग्रेजी स्कूल, गाॅरटन मिशन स्कूल इंदि खुलौ।
साथी खुलौ अस्पताल।
ऐबै स्लूकिये गूजै दि छ़ोटू लागै डांदै कौलम, नीबा आड़ै होल्डर।
तीना छ़ोटू लै बोला तै स्कूलियौ।
पहलै अंग्रेजी पौढ़ै लोग इंदि का नीकड़ै। 
सेउ सि पढ़ाइ बि इंदा का दूजै इलाकै तैंईं पुजि।
एथा सि स्लूकौ बि पूजौ इलाकै इलाकै दि।
शहरा तैंईं बि पूजौ।
शिमलै दि त तेबि सूट बूट ला तै लोग।
कुछ़ नेता लोग तै ज़ुण ला तै स्लूकौ।
किस्मत बि देखो, एक प्रचारक नेता रौओ शिमलै दि।
नाउं तौ नरेन्द्र मोदि।
तेउ लै बि सूखौ जौ स्लूकौ।
लांदौ लागौ सौ।
देखा देखी दूजै प्रदेशा दि बि लागै लोग स्लूकौ लांदै।
टैम बि कौसि कौसियो पूरौ साथ् दैआ। टैम बि ऐणु च़ाआ।
मोदि बौणौ प्रधानमंत्री।
स्लूकियो बि आऔ टैम।
भाग खूलै स्लूकिये।
लीडर त लीडर, हर ज़ागै लोग लागै स्लूकौ लांदै।
स्लूकिये दुकानैं खुलि गेई ज़ागा ज़ागा दि।
ऐबै त गर्म ठांडै सौभि तौरिये स्लूकै आ बज़ारा दि।
हिन्दी दि बोलू, राष्ट्रीय पोशाक गेइ बौणि स्लूकौ।
पर केतरै लोग ज़ाणा किदा का आऔ जौ स्लूकौ?
मूं बताऊ – कोटगढ़ा का। 
केबि कोटगढ़े शान तौ स्लूकौ,
ऐबै भारते शान अब स्लूकौ।
यह प्रयास इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि युवापीढ़ी कहीं न कहीं पहाड़ी बोली से विमुख होती जा रही है और यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि हम सब मिलकर  इन बोलियों का संरक्षण और संवर्धन करें, ताकि इन बोलियों को हिमाचली भाषा का स्वरूप देकर संविधान की आठवीं सूची में शामिल किया जा सके।

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