भूख के समान कोई बीमारी नहीं

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

गौतम बुद्ध एक बार एक अव्वाली गाँव गये, जहाँ सैकड़ों लोग उनका उपदेश सुनने इकठ्ठा थे। उनमें एक दरिद्र, किंतु कर्मठ किसान भी था। उपदेश सुनने की उसमें उत्कृष्ट इच्छा थी, पर उसका एक बैल खो गया था, जिसे ढूंढना उसकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर था। उसने तथागत बुद्ध को प्रणाम किया, पर उपदेश सुनने के बजाय बैल ढूँढ़ने निकल गया। शाम के समय वह बैल को साथ लिए भूखा-प्यासा किसान उसी जगह से निकला।

उसने पुनः बुद्ध के चरण छुए और कहां-प्रभु! अब मैं आपका उपदेश सुन सकता हूं। बुद्ध ने कुछ क्षण उसके थके-मांदे चेहरे को निहारा, फिर भिक्षुओं से बोले-पहले इसे भोजन कराओ। उसके भोजन कर चुकने के बाद बुद्ध ने वहां उपस्थित जन समुदाय को संबोधित किया। उस किसान ने एकाग्र मन से उनका उपदेश सुना, फिर अपने घर चला गया। उसके चले जाने के बाद बुद्ध ने वहां मौजूद लोगों के बीच यह कानाफूसी सुनी कि उस किसान के कारण बुद्ध ने बहुत देर से उपदेश दिया।  तब भगवान बुद्ध बोले-वह किसान मेरा उपदेश सुनना चाहता था, पर बैल ढूंढना उसके लिए सबसे जरूरी था। दिनभर भटकने के बाद भी उस भूखे किसान में शाम को रुककर मेरा उपदेश सुनने का धैर्य था, लेकिन उस भूखे किसान के सामने उपदेश देने लगता तो वह नहीं समझता। याद रखना! भूख के समान कोई बीमारी नहीं है। उपस्थित लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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