इदमेव सत्यं

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

संसार है एक नदिया, दुःख सुख दो किनारे हैं ! ना जाने कहाँ जायें, हम बहते धारें हैं!!
गीतकार अभिलाष ने 1975 में फिल्म रफ्तार के लिये यह जीवन की सत्यता यथार्थपूर्ण गीत को लिखा और जिसे सोनिक ओमी ने संगीतबद्ध किया था। कुछ इसी तरह का सवाल एक शिष्य ने जब अपने गुरु से किया तो उन्होंने उसे नगर में जाकर सबसे यह मालूम करने को कहा कि पता करो कि उनके जीवन में कभी दु्ःख का प्रसंग तो नहीं आया? शिष्य आज्ञा मिलते ही नगर में पहुँचा और सबसे पहले एक बड़े घर के सामने पहुँचकर अपनी जिज्ञासा घर के मालिक के सामने रखी। गृहस्वामी ने कहा-आप भी कैसी बात करते हैं। इस दुनिया में आकर कभी कोई दुःखों से बच सकता है?  यह मेरे पूर्वजों का घर है। पूर्वजों के छोड़े गए धन से मैंने व्यापार शुरू किया, किन्तु उसमें घाटा ही घाटा उठाया। एक मेरा छोटा भाई नालायक है, कुछ पैसा उसने उडा़ दिया। अब संघर्ष कर कुछ प्रतिष्ठा बचाने को प्रयत्नरत हैं।
 शिष्य ने जिसे सुखी समृद्ध समझा था वही दुखी निकला। शिष्य  दूसरे घर पहुँचा, वहाँ भी उसे कुछ वैसा ही उलझन, परेशान भरा जवाब मिला। सबने बताया कि वे सुखी कम दुःखी ज्यादा हैं। शाम को लौटकर शिष्य गुरू के पास पहूँचा और बोला-गुरुदेव नगर में हर व्यक्ति से मिला तो पता चला कि तो सबने जीवन में कुछ न कुछ चिन्ता और दुःख बताये। किसी ने भी अपने को पूर्ण सुखी नहीं कहा। तब गुरु ने कहा-“इदमेव सत्यं “अर्थात यही सत्य है। दुनिया में कहीं वियोग, कहीं संयोग का दुःःख है। कहीं संयोग वियोग दोनों का दुःख है। कहीं तृप्ति का कहीं अतृप्ति का दुःख है, अनेक कारण हैं, जो मनुष्य को संतप्त बनाते हैं। या यूँ समझिये कि संतुष्ट न होना ही सब दुःखों का बड़ा कारण है।  कर्म करें, प्रगति करें, लेकिन अपने अन्दर संतुष्टि का भाव सदैव बनाये रखें।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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