करुणा

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बनारस की एक व्यस्त सड़क पर एक घायल महिला पड़ी दर्द से कराह रही थी। साथ में पड़ा उसका शिशु भी भूख से बिलख रहा था। राह चलते राहगीर रुकते, उसे देखते और आगे बढ़ जाते। कुछ आपस में बडझबडाते,  पता नहीं कौन है, कहाँ से आई है। किसी के चेहरे पर सहानुभूति किसी के चेहरे पर उपेक्षा भाव लिये लोग गुज़रते रहे, लेकिन  कोई उसकी मदद के झंझट में नहीं पड़ना चाहता था।
     थोड़ी देर बाद वहाँ दो घोड़ोंवाली बग्घी गुजरी। घायल महिला और उसके बिलखते शिशु को देखकर उस पर सवार सज्जन ने बग्घी रुकवाई। कोचवान की मदद से औरत और बच्चे को बग्घी में लिटाया, फिर कोचवान को हुक्म दिया कि सिविल अस्पताल चलो। कोचवान ने उन्हें टोकते हुऊ कहा-मगर साहब अभी तो जरूरी मीटिंग में जाना है। अस्पताल जायेंगे तो वहाँ पहुँचने में देर हो जायेगी।  इस पर उन सज्जन ने कहा-वहाँ के लोग तो मेरी प्रतिक्षा कर सकते हैं, लेकिन इन दोनों के लिए एक एक पल भारी है। वैसे भी वहाँ मुझे परोपकार पर ही बोलना है। व्यवहार में अगर मैं परोपकार न करूँ और वहाँ परोपकार की सीख दूसरों को दूँ तो क्या यह दोगलापन न होगा। जल्दी अस्पताल चलो।
 कोचवान ने बग्घी सिविल अस्पताल की ओर मोड़ दी। बग्घी में माँ बेटा दोनों बड़ी राहत महसूस कर रहे थे। अस्पताल में जब दोनों का उपचार शुरू हो गया, तब ही उन सज्जन पुरुष ने कोचवान से कहा-अब मीटिंग में चलो। वह सज्जन व्यक्ति थे मदन मोहन मालवीय। मालवीय जी जरूरतमन्दों की सहायता करने का कोई अवसर छोड़ते थे। हमारे महानपूर्वज क्षत्रपति शिवाजी महाराज और लौहपुरुष सरदार साहब भी मानव सेवा का कोई अवसर कभी नहीं छोड़ते थे। आज की अवसरवादिता के समय यह प्रसंग प्रेरणादायक हैं। अगर दिल में दयाभाव है ,तो उसे अपने तरीके से सेवाभाव में जरूर लगायें।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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