कुछ चेहरे अपनों के

अ कीर्ति वर्द्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बुद्धिजीवी धर्मनिरपेक्ष, कुछ चेहरे अपनों के हैं,
धर्मनिरपेक्षता राग अलापें, वो चेहरे अपनों के हैं।
जिसने आवाज उठाई, उसको तालीबानी कहते,
भेड़ खाल में छिपे भेड़िए, ये चेहरे अपनों के हैं।

आतंकवाद पर जिनकी चुप्पी, काश्मीर पर बोल मुखर,
हिन्दू के मरने पर चुप्पी, अफजल मरने पर बोल मुखर।
बहन बेटियां और बच्चे मरते, बलात्कार के दंश झेलते,
तालिबान पर सबकी चुप्पी, इजरायल पर बोल मुखर।

हमको पीड़ा हर बेटी की, हिन्दू हो या मुस्लिम हो,
बच्चे भी भगवान रूप हैं, हिन्दू हो या मुस्लिम हो।
तुम कहते पैर की जूती, नहीं कोई अधिकार उसे,
हमको अपनी ही लगती, हिन्दू हो या मुस्लिम हो।

मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश

 

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