यह तेरी कैसी लीला है

डॉ. रमाकांत क्षितिज, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

स्वयं को श्रेष्ठ
दूसरे को निम्न
बुद्धि के कारण है
तम या रज के कारण
सतो
तम और रज
के प्रभाव में क्यों आ जाता है
यह तेरी कैसी लीला है
मन
सतोगुड़ी होकर भी
क्यों चंचल हो जाता है
इतनी घृणा मानव
कहां से पा जाता है
माना की विस्तार
हमारा स्वभाव
इसकी ख़ातिर अपनों
की लाशें बिछाता है
जितने युद्व मानव ने लड़े
कोई प्राणी नही लड़ा
इसके बावजूद
चौरासी लाख में स्वयं से
स्वयं को सर्वश्रेष्ठ कहलाता है
यह तेरी कैसी लीला है
सब कुछ जानकर भी
क्यों नही मान पाता है
अपनों का ही खून बहाता है
क्यों किसी को
अपने अधीन करने में
इतना सुख पाता है
कच्ची गगरी के चक्कर में
रोज नई चाक चलाता है
कितने ही माटी के बर्तन टूट गए
आगे भी टूटेंगे
माटी का बर्तन
टूट कर माटी ही बन जाता है
यह क्यों नही समझ पाता है
यह तेरी कैसी लीला है…

जूडपुर रामनगर विधामौवा जौनपुर।

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