कपड़ा और काया

डॉ. रमाकांत क्षितिज, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

काया की ख़ातिर
कपड़ा लिया सिलाय
सूत एक ही
तरह तरह के कपड़े लिया बनाय
कपड़े होंगे
तो अनेक रंग भी होंगे
कुछ को कुछ
कुछ को कुछ पसन्द होंगे
रंग भी कपड़ो में बंट जायेंगे
रंग तो कुदरत के
अपना अपना कहकर अपनायेंगे
रंग भी नर मादा हो जायेंगे
कपड़ा काया के लिए
कपड़े के लिए काया नही
काया से ज़्यादा
कपड़ों से पहचाने जायेंगें
काया को क्या फर्क पड़ता है कपड़ो से
जिन्हें कपड़े नहीं
वे हर मौसम को यूं ही सह जाते हैं
बिन कपड़े के कारण
ऊंच नीच ग़रीबी अमीरी से बच जाते हैं वातावरण के अनुसार
उसने हमें बनाया है
काया से ज़्यादा
कपड़ो में स्वयं को उलझाया है
काया तो एक दिन
बिन हंसा हो जायेंगी
जिन कपड़ो की ख़ातिर
काया को भी न पहचाना
वह कपड़े काम न आयेंगे
तब सब रंग उड़ जायेंगें
उसी काया संग
बिन रंग विदाई पायेंगे
सारे रंग यही के यही
धरे रह जायेंगे
हंसा जब काया से निकल जायेंगे
काया भी तो कपड़ा ही है
जिसको समझा अपना
वह भी तो तेरी अपनी न थी
बिन हंसा किसी काम न आई
काया तो किराये का घर निकली
न ही कोई अग्रीमेंट
न ही कोई समय सीमा
न कोई डिपॉजिट
अग्रीमेंट जब भी पूरा होगा
वो बिना बताए घर खाली करवाता है
कर्मानुसार दूसरा घर दिलाता है
बिन लौटाए कोई डिपॉजिट
कहीं और शिफ्ट कर जाता है
जिसे डिपॉजिट समझ
तू जीवन भर जोड़ता रहा
वह तो सिर्फ माया थी
भला माया कभी किसी के साथ
चली है
माया तो आदि से ठगती आई है
कभी वक्त पर किसी के काम आई है
तेरी ही तो नादानी थी
किराये के घर को अपना घर समझ बैठा
यहां तो एक ही मालिक है
बाकी सभी किरायेदार
भला किराए के घर में
कोई हमेशा रहता है…

जूडपुर रामनगर विधामौवा जौनपुर।

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