सुभाष चन्द्र बोस के साथी थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल्लूराम गवली

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कल्लूराम पिता खूबाजी गवली कूमिया देवास के ही नही, वरन् देश के गौरव रहे है। ये बचपन से ही आर्थिक कठिनाइयों से जूझते रहे। गाय-भैस चराना इनका पैतृक धंधा था। कुश्ती लड़ना, नाल उठाना, मुक्केबाजी आदि इनके शौक थे। ग्वाला जाति होने से दूध-घी खाकर जाने माने पहलवान बन गए। जब देश आजादी के लिये वीर सैनिकों की बांट जौ रहा था, तब कल्लूराम सुभाष चन्द्र बोस के आव्हान पर आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गए। उस समय उनकी दादी भी उन्हें सेनानी की गाड़ी तक छोड़ने गई थी।


कल्लूराम आजादी के लिये 4 मई 1945 से 20 फरवरी 1946 तक 9 माह 16 दिन लखनऊ एवं बर्मा की रंगून सेन्ट्रल जेल में रहे। जेल में फिरंगियों ने बहुत यातनाएं दी। उनकी वीरता से सुभाष बाबू बहुत प्रभावित हुए और उन्हें समय-समय पर हौसला अफजाई कर सम्मानित किया था। समय-समय पर इन्हें देश-भर में जवानों का उत्साह वर्धन के लिए आमंत्रित किया जाता था।
स्वतंत्रता की 25वी वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1972 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने ताम्रपत्र तथा अभिनंदन पत्र भेंटकर उन्हें सम्मानित किया था। स्वतत्रंता की 26वी वर्षगांठ पर मुख्यमंत्री प्रकाशचन्द्र सेठी ने राज्य की ओर से प्रशस्ति पत्र एवं सम्मानित राशि प्रदान कर सम्मानित किया था। सन् 1983 में हाईकोर्ट के वकील एवं अ भा ग्वाला समाज समिति के अध्यक्ष देवीलाल रियार ने ग्वाल शिरोमणि घोषित कर भारत सरकार से विशेष दर्जा देने की अपील की थी। शरद पूर्णिमा उत्सव के अवसर पर 29 सितंबर 1987 में ग्वाला समाजोत्थान समिति आगर मालवा ग्वाला समाज ने शाल, श्रीफल, पगड़ी से सम्मानित कर बैजनाथ महादेव का चित्र भेंट किया था।
गत वर्ष इनके परिवार के पार्षद राजेश यादव की पहल पर एक सरकारी स्कूल का नाम इनके नाम पर किया जा चुका है। केपी कालेज मार्ग तथा गवली चौराहे का इनके नाम पर किया जाना प्रस्तावित है। इसके अलावा इन्हें समय-समय पर कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जाता रहा है। शासन की ओर से इन्हें निशुल्क यात्रा, पैंशन आदि की सुविधाएँ दी गई थी। इनसे प्रेरणा लेकर आज आगर मालवा ग्वाला समाज के 52,धार के 45 तथा महू के 65 जवान देश सेवा में लगे हुए हैं। 30 मार्च 1988 को भारत माता का यह लाल सदा सदा के लिये हमसे दूर हो गये थे।

23, गवलीपुरा आगर, (मालवा) मध्यप्रदेश

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