शिवपुराण से……. (300) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

संध्या की तपस्या, उसके द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उससे संतुष्ठ हुए शिव का अभीष्ट वर दे मेधातिथि के यज्ञ में भेजना ………..

गतांक से आगे……………

संध्ये! जब तुम इस पर्वत पर चार युगों तक के लिए कठोर तपस्या कर रहीं थीं, उन्हीं दिनों उस चतुर्युगी का सत्ययुग बीत जाने पर त्रेता के प्रथम भाग में प्रजापति दक्ष के बहुत सी कन्याएं हुई। उन्होंने अपनी उन सुशीला कन्याओं का यथायोग्य वरों के साथ विवाह कर दिया। उनमें से सत्ताईस कन्याओं का विवाह उन्होंने चन्द्रमा के साथ किया। चन्द्रमा अन्य सब पत्नियों को छोड़कर केवल रोहिणी से प्रेम करने लगे। इसके कारण क्रोध से भरे हुए दक्ष ने जब चन्द्रमा को शाप दे दिया, जब समस्त देवता तुम्हारे पास आये, परन्तु संध्ये! तुम्हारा मन तो मुझमें लगा हुआ था। अतः तुमने ब्रह्माजी के साथ आये हुए उन देवताओं पर दृष्टिपात ही नहीं किया। तब ब्रह्माजी ने आकाश की ओर देखकर और चन्द्रमा पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त करे, यह उद्देश्य मन में रखकर उन्हें शाप से छुड़ाने के लिए एक नदी की सृष्टि की, जो चन्द्र या चन्द्रभागा नदी के नाम से विख्यात् हुई। चन्द्रभागा के प्रादुर्भावकाल में ही महर्षि मेधातिथि यहां उपस्थिति हुए थे। तपस्या के द्वारा उनकी समानता करने वाला न तो कोई हुआ है, न है और न होगा ही। उन महर्षि ने महान विधि-विधान के साथ दीर्घकाल तक चलने वाले ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ का आरम्भ किया है। उसमें अग्निदेव पूर्णरूप से प्रज्जवलित हो रहे हैं। उस आग में तुम अपने शरीर को डाल दो और परम पवित्र हो जाओ। ऐसा करने से इस समय तुम्हारी व प्रतिज्ञा पूर्ण हो जायेगी। इस प्रकार संध्या को उसके हित का उपदेश देकर देवेश्वर भगवान् शिव वहीँ अंतर्ध्यान हो गये। ( अध्याय 6)

(शेष आगामी अंक में)

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