सिलसिला

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सदियों से उम्मीदें सजाये
ये चल है सिलसिला,
बीतता हीं जा रहा है
ये जहां,ये जहाँ।
हवा भी चुप है सघन में
खामोश क्यों है आसमां?
ले रहें हैं सब्र की
ये सख्श किसके इंतहां
बीतता हीं जा रहा है
ये जहाँ,ये जहाँ।
सागर की लहरें कौन सा
छुपकर सुनाती हैं गजल
मूल तुम देखो नदी की
किस श्रोत से बहती अचल
पेड़ पर बैठा पपीहा
जल श्रोत को ललचा रहा है”
बीतता हीं जा रहा
ये जहाँ,ये जहाँ।
छाया यहाँ है पेड़ से
पर पेड़ पर तो धूप है”
ध्यान से देखो जरा
किसका गढा यह रुप है”
क्यों आसमां गिरता नहीं?
है किसके बल पे ये थमां”
बीतता हीं जा रहा
ये जहाँ,ये जहाँ।।
मझवार, चन्दौली

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