औरत सहनशीलता की मूरत

अदनान सिलावट, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

औरत सहन शीलता की मूरत है। समाज के निर्माण मे महिलाओं का बड़ा योगदान है, मगर समाज इस बात को मानने से इंकार किये बैठा है। शायद इसका कारण भी महिलाओं की सहनशीलता है। समाज महिलाओं को लेकर बहुत सख्ती करता है। समाज में महिलाओं को लेकर कई नियम बनाये जाते हैं, मगर पुरुषों के लिये कोई सख्ती नही है।

ये कहने में तो अच्छा नही लग रहा है, मगर ये हकीकत है कि जिस औरत (माँ) के कदमों के नीचे ईश्वर ने जन्नत को रख दिया समाज ने उसी औरत को मर्द के पैर की जूती समझा। अफसोस तो इस बात का है कि जिस नारी को खुद ईश्वर ने इतना सम्मान दिया। वही समाज ने उसी नारी के बारे में इतनी गलत सोच पाल रखी है।

आज भी कई लोग ऐसे है, जो बेटा और बेटी में भेदभाव करते हैं। समाज के नज़रिये में बेटा अपना और बेटी पराई होती है। समाज बेटे को अपना धन और बेटी को बोझ समझता है, मगर समाज ये बात अच्छे से जानता है कि यही बेटी
जिसे वो बोझ माने हुए है, ये किसी के घर बसने का कारण बनती है। मर्द सिर्फ घर बनाने का काम करता है, मगर उसे बसाने का काम औरत करती है।

अपने घर-परिवार के लिये औरत कई बलिदान करती है। अक्सर सिर झुका कर सबकी बातें भी सुनती है, मगर फिर भी इस सोच के साथ सब्र करती है कभी तो उसे कोई समझेगा। हमारा समाज सदेव महिलाओं से ये उम्मीद करता है कि वह पुरुषों की हर गलती को माफ कर दे। फिर वो चाहे महान बन कर या फिर बेचारी बन कर या पतिव्रता बन कर और वो कर भी तो क्या सकती है। औरत मर्द की हर गलती को नज़र अंदाज़ करती है, उन्हें माफ  करती है। इसलिये नही कि वह अबला है,  बल्कि औरत इसलिये माफ करती है, क्योंकि औरत ही माफ कर सकती है। आखिर ईश्वर ने उसे इतना विशाल हृदय जो दिया है। इसलिए औरत
सहन-शीलता की मूरत है।

जोधपुर, राजस्थान 

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