छवि विमर्श

वाणी बरठाकुर  ‘विभा’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

अम्बर पर है लाली छाई,
खेतों में हरियाली आई ।
महकी महकी लगे हवाएं,
शाखों पर कलियां मुस्काई।।
अम्बर पर है लाली छाई…..

लाल -लाल चूड़ी,चुनरिया,
अधरों पर लाली का पहरा।
लट कांधे पर आकर बिखरी,
कानों में झुमकों का पहरा।
धड़कन में मस्ती सी छाई  ।
शाखों पर कलियाँ मुस्काई…

पांव लगे महावर से मीठे,
गौरी मन ही मन मुस्काए ।
पैजन रुन झुन,रुन-झुन बोले,
सुधियों में साजन मन भाए।
प्रकृति ने हर दिशा सजाई ।
शाखों पर कलियां मुस्काई….

चमकीले मोती की माला,
अधरों बीच लगे मन भावन।
चंदन  जैसी महके हवाए।
अंगना आ के खड़ा है सावन।
आँचल से लिपटी पुरवाई ।
शाखों पर कलियाँ मुस्काई…

नैना रस्ता देख रहें है ,
कब आयेगें श्याम सवरियां।
सो-सो सपने नयन सजाकर,
देहरी पर बैठी बावरिया।।
मौसम को दे रही बधाई
शाखों पर कलियाँ मुस्काई…

तेजपुर, असम

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