बँधुआ लोकतन्त्र

प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

मसलन फटती साड़ियों, फूटते सरों, होते अपहरणों, लुटते मतों और बँधुआ होते लोकतंत्र की मार्मिक तस्वीरें, खबरें आती जा रही है। सरकारी मशीनरी की दुँदुभी ग़ज़ब बज रही है हुक्मरानों की ताल पर। नैतिकता नाम का पंछी उड़कर मानों पाकिस्तान कूच का एलान कर चुका हो। असली बात तो तब होगी, जब पुलिस पूछेगी कि सूती साड़ी काहे पहिन के गयी आप नामांकन करने। बनारसी पहनती वो भी भगवा तो कितना अच्छा होता और कितना सेफ़ होता। माने किसी कि हैसियत नहि होती फिर।
अब सोचों भला जो इत्ता लड़झगड़ कर, गिर-पड़कर जो ब्लॉक प्रमुख बनेगा, उसकी ज़िम्मेदारी ब्लॉक में प्रति होगी या कि उनके प्रति जिन्होंने उन्हें वोट दिया। आख़िर क़र्ज़ तो चुकाना ही होता है। बलेरों, स्कॉर्पीओ सफ़ारी थार आदि। महिन्द्रा वालों की तो टॉप लाइन इस बार क़तई गगनचुंबी हो जानी है।
सोचता हूँ कि इस समय वल्लभभाई पटेल ऊपर बैठे क्या सोचते होंगे कि जिस IAS, PCS बिरादरी को उन्होंने लोकतंत्र के रक्षार्थ बनाया था, जिसकी रिपोर्टिंग सीधे राष्ट्रपति को करायी थी ये सोचकर कि जब सत्ता निरंकुश हो तो ये पढ़े-लिखे समझदार, निर्णय लेने की तमाम क्षमतायों से लैस लोग प्रतिरोध करेंगे। पर ये तो क़तई सरल लोलक हो रखे है। जिसकी आवृत्ति का ठिकाना ही ना रहा।
सरकार, सरकारी मशीनरी, चुनाव हर हाल में जीत लेने जी ज़िद अभूतपूर्व है, जो लोकतंत्र के सत्ता के साथ बँधुआ होते जाने की दास्ताँ लिख रही है। आने वाली पीढ़ियाँ यक़ीनन गर्व करेगी और कहेंगी और कहेंगी जय बँधुआ लोकतंत्र जय सत्ता, जय उड़ती नैतिकता।
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।

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