प्रयागराज एक जीवन्त सांस्कृतिक नगर (एक समीक्षा)

अ कीर्ति वर्द्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

प्रयागराज एक जीवन्त सांस्कृतिक नगर लेखक गुंजन अग्रवाल की एक ऐसी कृति है जिसको पढ़ने के बाद पाठक अपने संग्रहालय में सदैव के लिए सुरक्षित रखना चाहेगा। किसी भी देश, नगर या ऐतिहासिक धरोहर की पहचान उसके लिखित इतिहास से ही कालांतर तक बची रहती है। भारत को सदैव से ही आक्रांताओं का सामना करना पड़ा। जिसके कारण हमारी संस्कृति, संस्कार, जीवन शैली के साथ साथ हमारी सामाजिक धार्मिक विरासत तथा धरोहरों को भी बहुत हानी उठानी पड़ी। यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत की प्राचीन संस्कृति श्रुति परम्परा तथा पौराणिक कथाओं के माध्यम से बहुत कुछ जनमानस में बची भी रही।
प्रयागराज सांस्कृतिक नगर है। वेद पुराणों से वर्तमान तक इसकी गौरवगाथा का वर्णन मिलता है। महाभारत में कहा गया है कि ब्रह्मा द्वारा प्रकृष्ट यज्ञ करने के कारण इस नगर का नाम प्रयाग पड़ा। प्रयागराज में ही तीन प्रमुख नदियों गंगा जमुना तथा सरस्वती का संगम भी होता है, इसलिए इसे संगम के नाम से भी जाना जाता है। राम कृष्ण बुद्ध महावीर का भी उल्लेख प्रयागराज से जुड़े सभी ग्रंथों में पाया जाता है। इतना ही नहीं आदिकाल से वर्तमान तक अनेकानेक महापुरुष, ऋषि मुनियों की धरती पर तात्कालिक शासकों की उपस्थिति, उनका प्रयाग के विकास में उल्लेख भी इतिहास में वर्णित है। प्रयागराज की भूमि धर्म अध्यात्म का केंद्र तो है ही, साहित्य संगीत तथा राजनैतिक दृष्टिकोण से भी यह भूमि समृद्ध रही है। प्रयागराज की यात्रा प्रतिष्ठानपुर से झू़ंसी, कौशाम्बी, कोसंबी से होता हुआ उत्तरकाल में प्रयाग बना। कालान्तर में शाहजहां के काल में इसे इलाहाबाद कहा गया, जिसे हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा पुनः प्रयागराज पद पर आसीन किया गया।
प्रयागराज, एक जीवन्त सांस्कृतिक नगर नामक इस पुस्तक में प्रयाग का इतिहास, पौराणिक महत्व, धार्मिक आध्यात्मिक दृष्टि से कुम्भ व कल्पवास का विस्तृत वर्णन, पुरोहित पण्डे, गली मुहल्ले, विश्वविद्यालय का इतिहास, प्रयागराज के चर्चित व्यक्ति, दर्शनीय स्थल, धरोहर, सभी प्रमुख शिक्षण संस्थान या यूं कहें कि ऐसा कोई विषय नहीं बचा जो इस पुस्तक में समाहित नहीं किया गया हो। गुंजन अग्रवाल खोजी इतिहासकार हैं। शास्त्रों का अध्ययन उनकी रूचि है। कालांतर में भी आपकी अनेक पुस्तकों का आस्वादन साहित्य समाज, विद्वतजन कर चुके हैं, जिनमें प्रमुख भगवान बुद्ध और उनकी इतिहास सम्मत तिथि, कुम्भ मेले- अतीत से वर्तमान की आध्यात्मिक यात्रा के साक्षी, महामनीषी डॉ हरवंशलाल ओबराय रचनावली, महामना मालवीय वांग्मय दिशा दर्शन, भारतीय इतिहास में सम्राट विक्रमादित्य आदि प्रमुख हैं। जिन पर चर्चा फिर कभी।
प्रयागराज-एक जीवन्त सांस्कृतिक नगर नामक यह ग्रंथ भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक ऐतिहासिक इतिहास की धरोहर बनेगा। गुंजन जी ने अपने अथक प्रयासों तथा प्राचीन से वर्तमान शास्त्रों, सरकारी दस्तावेजों के शोध से यह ग्रंथ तैयार किया है, इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। यह दस्तावेज भारत सरकार द्वारा सभी विद्यालयों, पुस्तकालयों, संत महात्माओं तक पहुंचाया जा सके तो सर्वोत्तम कार्य होगा। 304 पृष्ठ के ग्रंथ प्रयागराज-एक जीवन्त सांस्कृतिक नगर को डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली ने प्रकाशित किया है और इसका मूल्य 400/- रक्खा गया है, जो इसकी गुणवत्ता को देखते हुए काफी काम है।
विद्या लक्ष्मी निकेतन 53 महालक्ष्मी एंक्लेव मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश

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