धरती के देव है़ं सुकेत के  धार गांव में विराजित महीदेव

ङा. हिमेन्द्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

मण्डी जिले की सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि सैंधव व वैदिक कालीन रही है। पुरात्तात्विक व साहित्यिक स्रोतों के आधार पर यह निष्कर्ष रूप में सामने आया है कि माण्डव (मण्डी) व सुकुट (सुकेत) क्षेत्र में मानव सभ्यता के उषाकाल में सांस्कृतिक व सामाजिक व्यवस्था प्रचलित थी। सैंधवकाल में धरती पूजा का आविर्भाव व प्रचलन पुरातात्विक खोजों से प्रमाणित हो चुका है। हिमाचल में अच्छी फसल व तत्सम्बंधी बीमारियों के निवारण के लिये भूमि देव खेत्रपाल, खोड़ू व वन देवी की पूजा की जाती है। सायर का पर्व विशुद्ध रूप में प्रकृति देवी व प्रकृति की संचालन शक्तियों के लिये समर्पित है। नदी, पर्वत, उच्चस्थ शैल शिखर वृक्ष, गुल्म, जसस्रोत व जलाशय देव हिमाचल में शक्ति के प्रतीक रूप में पूजित हैं। करसोग उपमण्डल के पश्चिम में धार गांव में मही देव का पहाड़ी शैली का मंदिर आस्था का केन्द्र है। मही देव का मंदिर धार गांव में एक लघु पहाड़ी पर बना है। मंदिर की स्थिति को देखकर लगता है कि यहां कभी गढ़ रहा होगा। लगभग समतल भूमि पर अवस्थित महीदेव का यह मंदिर ऐसे गढ़ के मध्य स्थित है, जो समीप से भी दृष्टिगोचर नहीं होता। गढ़ की ऐसी स्थिति गढ़ निर्माण की सामरिक कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। महीदेव मंदिर के गर्भ क्षेत्र में शिवलिंग प्रतिष्ठित है, इससे महीदेव के शैव मत से संबद्धता की पुष्टि होती है। हिमाचल के संदर्भ में यह सर्वविदित है कि शिव का महादेव रूप सर्वव्यापक है। यहां के देव समुदाय का मौलिक विग्रह प्रस्तर पिण्ड हर मंदिर में स्थित है। यहां ब्रह्मा, विष्णु, देवता, ऋषि, नाग व देवत्व को प्राप्त किसी व्यक्ति का प्रारम्भिक स्वरूप लिंग रूप में ही प्रतिष्ठित है।
वास्तव में हिमाचल के महादेव प्रागैतिहासक व वैदिक देव होने के कारण नाग, वैष्णव व जड़ात्मवाद से भी अभिन्न रूप में जुड़े हैं। विष्णु से शिव की अविच्छिन्नता के कारण हिमाचल में शैव व वैष्णव मत की अभिन्नता के कारण मतावलम्बियों में भी पारस्परिक प्रभेद नहीं है। यही कारण है कि यहां के धर्मावलम्बियों में भिन्न-भिन्न मतों को लेकर कोई विवाद नहीं है। हिमचल का लोक बहुदेववादी है और सभी जीवजगत में एक ही तत्व की सत्ता के सिद्धात के पोषक रहे हैं।
महीदेव के धार गांव में प्राकट्य के विषय में यह मान्यता प्रचलित है कि महीदेव ब्राह्मण परिवार से सम्बंधित हैं, जो परिवार सहित महीसागर संगम के नामक गुप्त स्थान से धार गांव आये थे। मही सागर के सम्बंध में स्थिति स्पष्ट नही है। महीसागर संगम कोई तीर्थस्थल है, जो प्रयाग जैसे पवित्र स्थल से सम्बंधित है। महीसागर का सम्बंध क्षीरसागर से भी अभिप्रेत हो सकता है। चूंकि मही का एक अर्थ मट्ठा अर्थात् दही भी है। निश्चित रूप से यह ब्राह्मण परिवार किसी पवित्र स्थल से यहां आया होगा। मान्यता के अनुसार इस ब्राह्मण परिवार में दो भाई और एक बहन थी, जो अपनी शूरवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार समीपस्थ काण्ढा गांव में मुसलमानों का आक्रमण हुआ था। मुसलमान धावा बोल कर लूटपाट किया करते थे। मुसलमानों के उत्पात से पूरे क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मच गई थी। त्रस्त जनता ने तीनों वीर भाई-बहन से आततायियों से रक्षा की प्रार्थना की थी। तीनों ने जाकर मुस्लमानों का डटकर मुकाबला किया और उन्हे भागने के लिये बाध्य कर दिया था। इस संघर्ष में अग्रज को काफी चोटें आईं थी और वह घायल हो गया था। उसने लोगों से कहा कि जहां मेरा प्राणांत हो, वहां कोई बस्ती न बसे और वहां केवल प्रस्तर का ढेर ही प्रतीक रूप में रहे। वीर भाई ने धारेबाग नामक स्थान पर प्राण त्यागे थे। मृत्यु से पूर्व अग्रज ने कहां कि उसकी अंत्येष्टि उस स्थान पर हो, जहां से महामाया पांगणा का दुर्ग मंदिर दृष्टिगोचर हो। पुन: जब मेरा आविर्भाव हो तो उस स्थान से पांगणा सरिता के किनारे फेगल में मेरी बहन का मंदिर  दृष्टिगोचर हो। ब्राह्मण की इस अंतिम उद्घोषणा के अनुसार उस स्थान पर अंत्येष्टि की गई, जहां से महामया पांगणा का मंदिर स्पष्ट दिखता है। इस घटना से यह अनुमान लगाना सहज है कि सेन वंश के आदि पुरूष वीरसेन ने पांगणा में राजधानी स्थापित करने से पूर्व बेलरधार में अस्थाई राजधानी स्थापित की होगी और यहीं अपनी कुलदेवी कलकत्ता की काली रूपा महामाया को प्रतिष्ठित किया होगा। चूंकि बेलरधार की भौगोलिक स्थित सामरिक दृष्टि से अनुकूल हैं। यहां से सुकेत के अधिकत्तर क्षेत्र को एक दृष्टि से देखा जा सकता है। यहां कुछ समय तक रूकने के बाद अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर वीरसेन ने पांगणा की ओर प्रस्थान किया होगा। सम्भवत: महीदेव ने महामाया की शक्ति से ही मुसलमानों पर विजय पायी और स्वयम् की अंत्येष्टि के समय महामाया के मंदिर के दर्शन पाकर देवत्व प्राप्त किया था।

मही देव भूमि, फसल, पशुधन व महामारी हरण के सशक्त देव हैं। कहते हैं कि पूर्व में महामारी के प्रकोप को रोकने के लिये देवता के मंदिर पर महामारी शमन अनुष्ठान होते रहे हैं.। वास्तव में मही का शाब्दिक अर्थ पर्वत, धरणी या सृष्टि को धारण करने वाली शक्ति से है। महीदेव का सम्बंध इस आधार पर भूमिदेव से अधिक घनिष्ठ प्रतीत होता है। धरणी देव होने के कारण सृष्टि के आधार सदाशिव के अंशावतार होने के कारण लिंग रूप में उनका पार्थिव विग्रह गर्भगृह में स्वत: प्रादूर्भूत है। मंदिर के बायीं ओर महीदेव के अनुचर देव श्मशान वासी मशाणू का प्रस्तर विग्रह स्थापित है। साथ में एक अन्य अधीनस्थ बाण देव सेवा के लिये प्रस्तुत है। मंदिर में सूर्य भगवान की इन्डो-इरानी शैली की त्रिमुखी सूर्य मूर्ति  स्थापित है, जिसका काल 11वीं व 12वीं  शताब्दी का है। सूर्य नारायण की ठोडी पर दाड़ी है, जो इरानी प्रभाव को इंगित करती है।

महीदेव धार बेलर में प्रतिष्ठित मानव से दैवीकरण का उच्चस्थ उदाहरण है। महीदेव के अनुज पांगणा सरिता के किनारे मझांगण में देवरूप में प्रतिष्ठित हैं। महीदेव ने महप्रयाण के समय यह भी निर्देश दिया कि उनका मंदिर वहां बने, जहां से पांगणा सरिता के दायीं ओर फेगल में उनकी बहन छिबरी माता का मंदिर दृष्टिगोचर हो। धार गांव के महीदेव का प्राकट्य मानव में दैवीय गुणों व सामर्थ्य का जीवंत उदाहरण हैं। महीदेव धरणी देव हैं, जो उत्पादकता के देव हैं। उनके वीरोचित कार्य से देवत्व की प्राप्ति उच्च आदर्शों की प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिचायक है। सुकेत में हिमाचल के अन्य भागों की तरह कतिपय पावन आत्माओं के दैवीकरण की प्रतिष्ठा प्रचलित है। सुकेत के सेन वंश की राजुमारी चंद्रावत्ती ने अपने चरित्र की पवित्रता को सिद्ध करने के लिये जीवनोत्सर्ग किया था। चंद्रावती की पूजा देवी रूप में पूजित है। सुकेत रियासत के संस्थापक वीरसेन अपने कुरू वंश के चक्कवर्ती राजा युधिष्ठिर के अंशावतार होकर बाड़ादेव रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। महीदेव धार गांव, उनके अनुज मझांगण और बहन फेगल गांव में दैविक शक्ति रूप में मान्य देव हैं। वस्तुत: वेद भूमि सुकेत में शिव, शक्ति, विष्णु, ऋषि, नाग, यक्ष, महाभारत कालीन यौद्धा, दानव व सिद्ध पुरूषों की देव रूप में मान्यता प्रचलित है।

इतिहासकार व साहित्यकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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