कारगर चिकित्सा पद्धति हर्बल कम्पाउंड

डॉ. जे.बी.रुहिल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हर्बल कंपाउंड चिकित्सा शास्त्र एक नवीनतम चिकित्सा प्रणाली है। इस चिकित्सा प्रणाली में किसी भी विष को मिलाकर दवाइयां नहीं बनाई जाती। वनस्पति जगत के पौधों में एक ऊर्जा छिपी होती है। यही उर्जा शारीरिक रोगों को ही नहीं, अपितु मानसिक रोगों का भी पूर्ण रूप से निदान कर कर सकती हैं। इसका नियम ” law of presence of electricity in vegetable kingdom”  इस ऊर्जा को fermentation (simpal process) के द्वारा आसूत जल (dosti le water) के अंदर एकत्रित की जाती है।
 भौतिकी सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता केवल रूपांतरित किया जा सकता है। इसी सिद्धांत के अनुसार पौधों की ऊर्जा को fermentation (simpal process)  के द्वारा आसूत जल (distile water) में रूपांतरित कर लिया जाता है।रूपांतरित की गई ऊर्जा शक्ति पानी मे सत्व के रूप में बन जाती है तो इसे रोगानुसार प्रयोग में लाया जाता है ।
  कंपाउंड हर्बल चिकित्साशास्त्र में भोजन,शारीरिक व मानसिक क्षमता को लेकर चिकित्सा की जाती है। मनुष्य को भोजन वनस्पति जगत से प्राप्त होता है, तथा रोगों का निदान भी वनस्पति जगत से ही होता है ।भोजन  हमारे शरीर का मूल है। भोजन के द्वारा शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है। भोजन पर ही हमारा शरीर निर्भर करता है ।सभी मनुष्य एक प्रकृति के नहीं होते ।यह पद्धति सभी की प्रकृति के आधार पर चिकित्सा करती है। सभी की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है और ऋतुनुसार  प्रभावित हैं।
         ऋतुनुसार भोजन करना चाहिए। यदि शरद ऋतु में ठंडा भोजन करेंगे तो ठंड से होने वाले रोग उत्पन्न होंगे जिससे मनुष्य की प्रकृति के लक्षण बढ़ेंगे। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में गर्म तासीर का भोजन करेंगे तो गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोग बढ़ेंगे और पित्त प्रकृति के लक्षण बढ़ेंगे। इसी प्रकार वात को बढ़ाने वाला भोजन लेंगे तो वात के लक्षण बढ़ेंगे।जिस प्रकार अशुद्ध भोजन  लेने से शरीर प्रभावित होता है और मन को भी प्रभावित करता है ।यदि हम शुद्ध भोजन करेंगे तो हमारा मन सात्विक प्रवृत्ति का बनेगा। यदि हम भोजन तेज मिर्च, मसालेदार लेंगे तो शरीर मे उत्तेजना पैदा करेगा और उत्तेजित शरीर में से राजसी प्रवृत्ति के लक्षण बढ़ेंगे।यदि हम भोजन में मांस- मदिरा, बासी व गला सड़ा खाएंगे तो मन तामसिक प्रवृत्ति का हो जाएगा।
Cell–Tissu -organ -systam -Body–  :–
 इस प्रकार हमारा शरीर complex है।जब हम अशुद्ध व ऋतुविरुद्ध भोजन करेंगे तो सबसे पहले पाचक रस दूषित होगा। फलस्वरुप पाचन संस्थान भी दूषित होगी और रक्त और लसीका संस्थान भी दूषित होगा।  फिर रक्त और लसीका संस्थान दुषित हो जाता है।तब रोग मिश्रित (complex) बन जाता है। ऐसे मिश्रित रोगों के निवारण के लिए दवाइयां भी मिश्रित चाहिए। रोगी को रोगानुसार ही भोजन देना चाहिए,क्योंकि ऐसे में रोग कम तो होगा मगर पूर्ण रूप ठीक नहीं होगा।
     बीमारी के ठीक न होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। ऐसे में रोगी के मन की भावनाएं  सकारात्मक से नकारात्मक की ओर बढ़ने लगती है। नकारात्मक सोच से रोगी में डर, क्रोध,भय और तनाव आदि भाव पैदा होते हैं,रोगी मृत्यु के भय से चिड़चिड़ा हो जाता है।  अपने आपको असहाय महसूस करता है।अनेक परिस्थितियों में रोगी आत्महत्या तक कर लेता है। अधिक सोच-विचार करने से मनोबल कमजोर हो जाता है, जिससे तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है,परिणामस्वरूप रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है। रोग बढ़ने लगता है और सही समय पर चिकित्सा नही मिलने पर वह लाइलाज या असाध्य बन जाता है।
 Law of similarity समानता से समानता के अनुसार जैसे कोई व्यक्ति pneumonia +skin Allergy + hypertension  से पीड़ित है तो वह मानसिक रूप से भी उस रोग से ग्रस्त है। अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण रोग होने से पहले ही उसके भाव आने शुरू हो जाते हैं। इस कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और रोगी तेजी से रोग की चपेट में आ जाता है। यह पद्धति बहुत ही सरल, स्पष्ट और रोगों की जड़ पर कार्य करती है। यह बहुत ही सस्ती व पर्यावरण रलक हैं। अधिकांश pathies में वनस्पति का एक का बड़ा हिस्सा दवा बनाने में प्रयोग होता है। इस pathies में थोड़ी सी वनस्पति से बड़ी मात्रा में दवा तैयार की जाती है।
 यह चिकित्सा पद्धति सबसे भिन्न और पूर्णतः शरीर मे बिना किसी दुष्प्रभाव के कार्य करती है।आज भी अनेकों क्षेत्रीय पौधे जो एक क्षेत्र विशेष  पर प्रभाव कारी हैं। इस पद्धति में विभिन्न क्षेत्रीय पौधों का समावेश है।
एसएमकेडी इलेक्ट्रोपैथी कंपाउंड हर्बल मेडिकल इंस्टीट्यूट रिसर्च सेंटर, दहकोरा, जिला झज्जर( हरियाणा)

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