सच्चा मित्र है बरगद का वृक्ष (एक संस्मरण)

अवधेश कुमार निषाद मझवार, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सुबह तैयार होकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में अपनी साइकिल से ड्यूटी जा रहा था। उसी समय माता जी का कॉल आया, मां बोली-बेटा! जो अपने आंगन में बरसों पुराना बरगद का पेड़ लगा हुआ है। उसे परिवार के बंटवारे के कारण काटने को कह रहे हैं। बेटा! तू कुछ कर, वह भी तो तेरा भाई जैसा है. मां की बात सुनकर मैं बहुत दुःखी हुआ। आंगन में लगे बरगद के वृक्ष के साथ बचपन की यादें तुरंत ताजा ही गईं। वह पेड़ मेरे जन्म से पहले का है। यह बात अलग है कि बचपन के समय वह इतना बड़ा नहीं था। आज बहुत विशाल हो गया है। उस पर हम सभी भाई बन्दर की तरह कूदते-फांदते थे, साथ ही उसके मीठे-मीठे गूलर बहुत खाएं हैं। बरगद के पत्तों से बचपन के खेलों में दावत के लिए दोने-पत्तल भी बनाया करते थे। पूरे गांव के बच्चे बरगद के नीचे आकर खेलते थे।

आज भी गर्मियों के दिनों में गांव के बड़े-बूढ़े ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए आंगन में बैठने आ जाते हैं और फिर बैठकर सभी लोग पुरानी कहानियां सुनते हैं। बचपन के खेलों में हुरुक-डंडा, छिपी-छिपा, आस-पास आदि खेल खेलते थे। यह सब बातें याद करके मैं हृदय से रोने लगा। कार्यालय में मैंने अपने सर से बात करके बताया कि मां जी का कॉल आया है, घर में कुछ बहुत जरूरी काम है। सर ने कहा ठीक है, ध्यान से जाना और घर पहुंचकर हाल-चाल बताना। बस स्टैंड पहुंचकर रोडवेज से ही घर के लिए निकल पड़ा। अगली सुबह चार बजे घर पहुंच गया। मां ने बताया कि ताऊ जी के हिस्से में वह जगह आ गई है, जिसमें वह बरगद का वृक्ष है। अब वह लोग उसे काटने की बात कह रहे हैं। तुझे तो पता ही है, बरगद के पेड़ के बिना इस आंगन में रुकना एक क्षण भी मुश्किल होगा। अब तुझे ही कुछ करना होगा। मां को मैंने विश्वास दिलाया कि आप चिंता ना करें, मैं कुछ ना कुछ उपाय जरूर निकाल लूंगा।

तुरंत ही मैं ताऊ जी के घर पहुंचा, पैर छूकर प्रणाम किया और उनकी कुशल मंगल के बारे में पूछा। उन्होंने कहा-सब ठीक है, तू बता, कैसा है। अभी दो दिन पहले ही ड्यूटी गया था, अचानक फिर क्यों? मैंने ताऊ जी को बताया-माता जी का फोन गया था कि बरगद के पेड़ लिए कुछ दिक्कत आ रही है। ताऊ जी ने बोला- हां वह जमीन हमारे हिस्से में आ रही है। लकड़हारों को बरगद के पेड़ को काटने के लिए बोल दिया है। मैंने ताऊ जी से कहा-आप इस पेड़ को ना काटे, इसके बिना फिर हम सब लोगों को ठंडी हवा, छाया कहां से मिलेगी ? किसी तरह बात बनी और ताऊ जी 40 हजार रूपए में 10 फुट जगह देने को तैयार हो गए। मैंने घर से लाकर ताऊ को पैसे दे दिए। उन्होंने कहा-मैं अब कुछ नहीं कहूंगा, ये जगह अब तुम्हारी हुई।

घर जाकर सब बात मैंने माता जी को बताई तो मां की आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे। हमें विश्वास था कि तू कुछ ना कुछ उपाय जरूर निकालेगा। आज तूने मेरे एक और बेटे की जिंदगी बचाई है, मैं तुझसे बहुत खुश हूं। मैंने कहा-मां! ये मेरा कर्तव्य है, भले ही वह बरगद का वृक्ष है, अपने आंगन में रहता है तो मेरे भाई जैसा हुआ। बचपन के समय आस-पास बहुत से पेड़ पौधे थे तथा बहुत सारे बचपन के दोस्त थे। आज जनसंख्या वृद्धि के कारण एवं गांव का शहरीकरण करने के लिए लोगों ने पेड़ों की कटाई करना सही समझा, लेकिन बहुत बुरा परिणाम हुआ। आज लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं। जब भी मैं घर जाता हूं, मेरे बचपन के कुछ दोस्त बेरोजगारी के चलते शहर की ओर पलायन कर गए हैं। कुछ दोस्त धनवान होने के घमंड में सीधे मुंह बात नहीं करते है। सब लोग अपनी अपनी दुनिया में मस्त हैं, लेकिन मेरा सच्चा मित्र बरगद का वृक्ष है। वह मेरे जन्म से पहले का है। मेरे लिए हमेशा अपनी शाखाओं के रूप में अपनी बांहें फैलाए हुए मिलता है। मुझसे कहता है कि पता नहीं तू कहां चला जाता है, मैं तेरे बिना अकेला रह जाता हूं। मेरे पास आजा, बहुत थक गया होगा। आ! तेरे चेहरे की सभी टेंशन हो छूमंतर कर दूंगा। वास्तव में मुझे उसके पास आकर बहुत खुशी मिलती है और बचपन की पुरानी यादों में खो हो जाता हूं। आप सभी से अनुरोध करता हूं कि अगर आप के आस-पास कोई भी हरे-भरे , पेड़-पौधो को काट रहा हो तो उसे समझाने का प्रयत्न करें। ज्यादा से ज्यादा लोगों को वृक्षारोपण के प्रति जागरूक करें, क्योंकि हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध रहेगा? तो हमारा पर्यावरण हमेशा संतुलित बना रहेगा। आज से मैं प्रण लेता हूं कि प्रत्येक वर्ष कम से कम 5 पौधे अवश्य लगाऊंगा। आखिर! पर्यावरण बचाना जरूरी है….।

ग्राम पूठ पुरा पोस्ट उझावली, फतेहाबाद (आगरा) उत्तर प्रदेश

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