ये ताश के बावन पत्ते

त्रयंबकेश्वर त्रिवेदी “सुनीलजी”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

ये ताश के बावन पत्ते, भाई पत्ते कितने अच्छे।
इक्के से एकता का, सबक लेना चाहिए ।
दुक्की से न्याय दो तरह, नहिं होना चाहिए।।
तिक्की से तिकड़मों का, कभी काम नालगे।
चउवा से चारों ओर कोई, इल्ज़ाम ना लगे ।।
पंजे से पवन शुद्ध, प्रदूषण रहित मिले ।
छक्के से सभी इन्द्रियों को, शुद्ध मन मिले।।
सत्तेसे सुख, समृद्धि पहुंचे, शहर, गांव के रस्ते-रस्ते।
ये ताश के …
अट्ठे से आठों याम, काम काम से रहे ।
नहिले से नई पीढ़ियां, सन्मार्ग ही गहें ।।
दहिले से दल बनें नहीं, अब संप्रदाय के।
गुल्ले से ख़तम गुंडई, हों कार्य न्याय के।।
बुरे ताश के पत्ते अच्छे, तब होंगें ये भाई।
नर, नारी हम सबके द्वारा, मुहिम जाय अपनाई।।
बादशाह, बेगमें करें जब, काम अच्छे-अच्छे।
ये ताश के …
हुकूमत हुक्मरानों की तब, सराही जाएगी।
मेहनत कसी जब पान में, खिलाई जाएगी।।
ईटें से नींव देश की, मजबूत होगी तब ।
श्रृद्धा व प्यार रूपी, फूल खिलें जब ।।
ताश के पत्ते बुरे हैं, किन्तु है सबक ।
अच्छाई पड़ी भारी, बुराई पे आज तक ।।
कष्ट सहें जोकर की तरह, पर दीखें हंसते-हंसते।
ये ताश के बावन पत्ते, भाई पत्ते कितने अच्छे।
पत्रकार, अवधी गीतकार व लोक रंगकर्मी लखनऊ, उत्तर प्रदेश  

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