पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कौशल नहीं, एम फैक्टर से मिली ममता को कुर्सी


हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की पुरजोर कोशिशों के बावजूद ममता दीदी ने आखिर तीसरी पूर्ण बहुमत की सरकार में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ही ली। बंगाल की शेरनी के नाम से प्रख्यात् ममता दीदी की यह जीत केवल उनके राजनीतिक कौशल का नतीजा नहीं है, बल्कि ये केवल आंकडों की बाजीगरी है। तृणमूल कांग्रेस की इस अप्रत्याशित जीत में ट्रिपल एम फैक्टर अधिक प्रभावशाली रहा है। एम फैक्टर यानी मुस्लिम, महिला और मतुआ। एम फैक्टर (ट्रिपल एम) में से मुस्लिम फैक्टर भाजपा की कथित हन्दुवादी सोच के चलते भले ही पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं का ध्रुवीकरण न हुआ हो, लेकिन मुस्लिमों ने भाजपा को हराने के लिए ममता दीदी पर ही विश्वास जताया और ओवैशी व फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को पूरी तरह नकार दिया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि खुद ओवैशी और पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने खुद को पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता दीदी के समक्ष सरेंडर कर दिया था, जिसके चलते फुरफरा शरीफ के प्रभाव वाले 24 परगना, उत्तर 24 परगना, हुगली, हावड़ा, बर्दमान और बीरभूम में भी ममता दीदी का परचम लहराया है। बंगाल की 294 सीटों में से लगभग 70 से 100 सीटों पर मुस्लिम आबादी का अनुपात 27 से 30 फीसदी तक है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर जनपद जहां मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से ऊपर है। इसके साथ पश्चिम बंगाल को मातृशक्ति की जमीन माना जाता है और भाजपा ममता दीदी के समान प्रभाव वाली महिला को वहां का चेहरा बनाने में कामयाब नहीं हुई, जिसका पूरा फायदा ममता बनर्जी को मिला और महिला वोट का अधिक प्रतिशत उनके पक्ष में गया। 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर मतुआ समुदाय की जबरदस्त पकड़ वाले क्षेत्रों में भाजपा 2019 जैसा विश्वास स्थापित नहीं कर सकी, लिहाजा मतुआ समुदाय का अधिक वोट ममता की झोली में समा गया।
यूं तो देश में मुस्लिमों के लिए भाजपा एक अछूत राजनीतिक दल की तरह है, लेकिन पश्चिम बंगाल की स्थिति और भी नाजुक है, क्योंकि वहां गैर हिन्दुओं की बड़ी ऐसी है जो बंगाल से आकर यहां गैरकानूनी ढ़ंग से रह रहे हैं, लेकिन उन्हें ममता की बदौलत वोट का अधिकार प्राप्त है। उनके मन में यह डर था कि यदि भाजपा सत्ता में आयी तो उन्हें यहां से जाना पड़ सकता है। यह बात किसी छुपी नहीं है कि पश्चिमी बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर बांग्लादेश से मुसलमानों की अवैध आवाजाही और घुसपैठ लगातार हो रही है, जिसके चलते वहां मुस्लिमों की आबादी का वृद्धि प्रतिशत 63.67 रिकार्ड किया जा चुका है। भाजपा के सत्तासीन होने पर इस अवैध आवाजाही के रूक जाने के भय के कारण ही मुस्लिमों ने इतहार, जलंगी, सागरदिघी, भरतपुर, मालतीपुर, रतुआ व आसनसोल उत्तर सीट पर ओवैसी के प्रत्याशियों को जमानत भी गंवानी पडी। उन्हें सिर्फ 0.01 प्रतिशत ही वोट मिले।
कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति मुसलमानों को नाराज करके नहीं लड़ी जा सकती। शायद इसलिए राजनीति के जानकार ओवैसी को भाजपा की रणनीति का हिस्सा मान रहे थे और वे मुस्लिमों को यह बात समझाने में कामयाब भी रहे कि ओवैसी की पश्चिम बंगाल चुनाव में एंट्री ही बीजेपी को फायदा पहुँचाने के लिए हुई है, ताकि उनकी पार्टी टीएमसी के मुसलमान वोट काट सके। इसके साथ ही बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेता तक सार्वजनिक मंचों से कह रहे थे कि ममता को सिर्फ मुसलमानों की परवाह है, वो उन्हीं के लिए ही काम करती हैं, क्योंकि वही उनके वोटर हैं। ममता को मुस्लिम परस्त साबित कर हिंदू वोटों को अपने पक्ष में करने का दांव बंगाल में बीजेपी के लिए उल्टा पड़ गया। जैसे-जैसे ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों की बौछार हुई, वैसे-वैसे मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण ममता के पक्ष में होता गया, जिसके चलते मुस्लिमों ने ओवैसी और पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को नकार दिया और तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा वोट किया। ममता बनर्जी का चुनावी प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर का भी स्पष्ट मानना था कि बीजेपी जितना ध्रुवीकरण का दांव चलेगी, उसका ज्यादा टीएमसी को फायदा मिलेगा, क्योंकि यह खेल एकतरफा नहीं है।
साल 2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का कब्जा था, लेकिन उसके बाद इस तबके के वोटर धीरे-धीरे ममता की ओर आकर्षित हुए और साल 2011 और 2016 में इसी वोट बैंक की बदौलत ममता सत्ता में बनी रहीं। ममता बनर्जी की सरकार बनवाने में मतुआ समुदाय की भी अहम भूमिका रही है। नदिया, उतनदिया सहित उत्तर व दक्षिण 24 परगना जिले की 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर मतुआ समुदाय की जबरदस्त पकड़ मानी जाती है। मतुआ समुदाय के लोग बंगलादेश से आकर पश्चिम बंगाल में बसे हैं। सीएए के तहत नागरिकता की मांग मतुआ समुदाय का सबसे अहम मुद्दा है। यही वजह है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मतुआ समुदाय की पहली पंसद बीजेपी बनी थी, लेकिन इस बार दीदी इन्हें लुभाने में कामयाब रही।
ज्ञात हो कि बंगाल पर इस्लामी शासन 13वीं शताब्दी से प्रारम्भ हुआ था। 13वीं शताब्दी में यह व्यापार तथा उद्योग का एक समृद्ध केन्द्र में विकसित हुआ। 15वीं शताब्दी के अन्त में यहाँ यूरोपीय व्यापारियों का आगमन हुआ था। 18वीं शताब्दी के अन्त तक यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नियन्त्रण में आ गया था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उदगम यहीं से हुआ था। सूत्रों की मानें तो नक्सलवाद जैसे शब्दों का जन्म भी यहीं हुआ था। इसके साथ ही रसगुल्ले का आविष्कार भी पश्चिम बंगाल में ही हुआ था।

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