बचपन चालीसा (13 मई जन्मदिवस पर विशेष)

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बचपन से पचपन सुनो, जीवन का सब गान।
परम पिता का साथ है, कहत हैं कवि मसान।।

बालक भगवन रूप कहाई।
निश्छल मूरति लगत सुहाई।।1
हंसते खेलत चित्र बनाते।
उछलकूद कर मन बहलाते।।2
माटी के घर द्वार बनाये।
पात फूल से मांच सजाये।।3
रूखा सूखा सब मिल खाते।
तीज त्यौहार कपड़े पाते।।4
बाल पने से जंगल जाता।
नितउठ भैसे गाय चराता।।5
वन के खेल बड़े सुखदाई।
गुलाम डंडा पेड़ चढ़ाई।।6
पैरों में कांटे लग जाते।
कभी कभी तो ठाठ बनाते।।7
लेज बालटी खेंचा पानी।
भरते मटके घर के आनी।।8
कपड़े धोकर फिर हम न्हाते।
कंघा करके स्कूल जाते।।9
गिल्ली डंडा भी हम खेले।
मारा टोला गिल्ली झेले।।10
टेसू झेंजी क्वार मनाते।
शरद पूर्णिमा ब्याह रचाते।।11
सर्द रात में आग जलाते।
बाल कहानी रोज सुनाते।।12
सांप नेवला घरे दिखाते।
निर्भय होकर उन्हें भगाते।।13
वन में पूजा पाठ कराते।
गोवरधन को भोग लगाते।।14
ज्वार तुअर के खले सुहाते।
बंटते लड्डू खुशी मनाते।।15
गेंदा काका टीचर घर के।
मार लगाते कान पकर के।।16
फिर शाला में करी पढ़ाई।
चौथी कक्षा भरती पाई।।17
जोड़ बांकी गुणा कराते।
अंत समय प्हाड़े रटवाते।।18
डिक्टेशन भी खूब लिखाते।
मुर्गा बन के डंडे खाते।।19
मिडिल परीक्षा करी पढ़ाई।
चढ्ढी छोड़ नेकर सिलवाई।।20
सूती कपड़ा झोला आया।
किताब कापी पेन जमाया।।21
सात रुपैया फीस न पाते।
डर के मारे हम घबराते।।22
रामचरित सामूहिक गाते।
ढोल मंजीरा संग बजाते।।23
दोह सवैया साख बनाई।
वृद्ध सभा में मिलती वाही।।24
खेल गेंद का ऊल गदागद।
बाल सभा में पूजी शारद।।25
नक्शे भी हम खूब बनाये।
खेले नाटक श्लोक सुनाये।।26
जब मंचों पर होती बातें।
पंडित कहकर मुझे बुलाते।।27
मिडिल बोर्ड में अव्वल आया।
तीन बरस तक नाम कमाया।।28
फटे पुराने कागज लाते।
सुइ धागा तैयार कराते।।29
कोर्स पुराना नवमी पाया।
साइंस गणित छात्र कहाया।।30
खेल क्रिकेटा चश्का भारी।
सरदी गरमी नही विचारी।।31
कुआ बावड़ी खूब नहाते।
मच्छी गोता तुरत लगाते।।32
छुट्टी में जब घर को आते।
चुहा पेट में दौड़ लगाते।।33
नमक मिर्च की चटनी बांटी।
तेल मिलाकर खाते रोटी।।34
गणित ज्ञान की महिमा भारी।
देख रसायन हृदय दुखारी।।35
पितु भौतिक हिन्दी महतारी।
अंगरेजी भी लगती प्यारी।।36
होली के भी रंग निराले।
पीकर भांग बने मतवाले।।37
चरखी भी हम खूब चलाते।
गन्ना रस से गुड बनवाते।।38
प्यारे पचपन वापस आजा।
संघर्षी जीवन को खाजा।।39
यह चालीसा मैंने गाया।
बचपन का सब हाल सुनाया।।40

तेरह मइ पूरण भये, पूरे पचपन साल।
मां शारद किरपा करी, पिता भये खुशहाल।।

23, गवलीपुरा आगर, (मालवा) मध्यप्रदेश

Related posts

Leave a Comment