यूज एंड थ्रो बनते पत्रकार


हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

पत्रकार जोे सबके बारे में लिखते हैं, पर उनके बारे में सही बात जनता तक कम ही पहुँचती है। स्थिति ये है कि पत्रकार यूज एण्ड़ थ्रो बनकर रह गये हैं। सत्ता व विपक्ष के नेता व कार्यकर्ताओं से लेकर शासन-प्रशासन में बैठे छोटे-बड़े अफसरों की सारी कवायद पत्रकारों को केवल यूज करने भर तक सीमित रहती है। आमजन को भी पत्रकारों से बहुत उम्मीदें रहती हैं, लेकिन वह किसी हाल में है, किसी को जानने की फुर्सत नहीं। कई बार हुआ है कि किसी के खिलाफ खबर प्रकाशित होने पर सम्बन्धित अफसर पत्रकार पर घूस लेने का आरोप जड़कर अपना पीछा छुडा लेता है और उसके आला अफसर भी प्रकाशित खबर की सच्चाई जानने की कोशिश किये बिना ही दागी अफसर की बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते हैं। पूरा साल किसी की खबरे छापने के बाद जब कोई पत्रकार अपने संस्थान के लिए अवसर विशेष पर विज्ञापन आदि की अपेक्षा करता है तो पत्रकार तुरन्त ही भ्रष्ट की श्रेणी में आ जाता है। ये बात किसी से छुपी नहीं है कि पुलिस-प्रशासन द्वारा पत्रकारों के दमन के कई मामले भी सामने आए हैं। लाॅकडाउन के बाद मार्च में मुसहर समुदाय द्वारा घास की रोटी खाए जाने की खबर छापने पर प्रशासन द्वारा धमकियां दी गयी। बनारस में प्रधानमंत्री मोदी के गोद लिए गांव की भुखमरी की खबर छापने पर पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। पत्रकार द्वारा मिड-डे मील की तश्वीर दिखाने पर पत्रकार को जेल की हवा खानी पड़ी। अधिकांश पत्रकारों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ केस इसलिए हुए क्योंकि उन्होंने स्थानीय स्तर पर कोरोना वायरस से निपटने के लिए उठाए गए कदमों की नाकामी और स्थानीय अधिकारियों की कमियों को उजागर किया था। ऐसे एकाध नहीं, बल्कि रोज-रोज के अनगिनत मामले सामने आते रहते हैं। इतना ही नहीं महामारी के बारे में रिपोर्टिंग के लिए सरकार द्वारा कई तरह के तरीके अपनाए गये। सरकार ने इस बात का पुरजोर प्रयास किया कि केवल सरकारी आंकड़ों को ही प्रकाशित किया जाये। इसके लिए बाकायदा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह निर्देश जारी करे कि कोविड के बारे में उन आँकड़ों को प्रकाशित न किया जाये, जिन्हें सरकार ने जारी नहीं किया हो। वो तो भला हो न्यायालय का कि उसने सरकार के इस अनुरोध को ठुकरा दिया था। इसके बावजूद कोविड से जुड़े समाचार पर नियंत्रण करने की कोशिश में सरकारों ने जो कदम उठाए हैं, उससे पत्रकार बिरादरी में रोष है। इसके खिलाफ कुछ ने दिल्ली और केरल उच्च न्यायालयों में याचिकाएं भी दायर की हैं। पत्रकारों की मुसीबतें बस यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि नौकरी जाने की शुरुआत मार्च में लाॅकडाउन के कुछ समय बाद ही हो गई थी। बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला गया और ये सिलसिला अब तक जारी है। अधिकतर मीडिया संस्थान पत्रकारों से फ्री में ही काम कराना चाहते हैं और यदि कुछ देते भी हैं तो वो केवल ऊंठ के मुंह में जीरे के समान। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में हालत और भी खराब है। यहां क्षेत्रीय पत्रकारों को वेतन देने के स्थान पर उनसे फ्रंचाईसी के नाम पर सिक्योरिटी मनी ली जाती है और इसके बाद प्रतिमाह रिवेन्यू का टारगेट फिक्स कर दिया जाता है। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि जब किसी पत्रकार पर कोई मुसीबत आयी तो सम्बन्धित मीडिया संस्थान ने उसे अपना पत्रकार मानने से ही इंकार कर दिया।
देश में कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर ने समाज के हर हिस्से को बुरी तरह से प्रभावित किया है, इससे पत्रकार भी अछूते नहीं रहे हैं। देश में अब तक 100 से अधिक पत्रकार कोरोना वायरस के संक्रमण से अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें से 52 की मौत अकेले अप्रैल में हुई। इसका सीधा सा मतलब है कि इस महीने हर दिन लगभग दो पत्रकारों की मौत हुई है। हालांकि प्रदेश सरकार ने पत्रकारों के हित में कई कदम उठाये हैं, लेकिन वे ऊंठ के मुंह में जीरे के समान ही हैं। पत्रकारों के साथ सबसे भद्दा मजाक तो ये ही है कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारों को आज तक कोई संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया है। प्रेस की आजादी किसी कानून या संविधान में शायद दर्ज ही नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू है। वह पत्रकारों को कोई विशेष अधिकार प्रदान नहीं करता है। आज वेतनभोगी डाॅक्टर, सफाईकर्मी, पुलिसकर्मी और न जाने किसे-किसे कोरोना योद्धा के खिताब से नवाजा गया है, लेकिन पत्रकारों को कई बार मांग करने के बाद भी कोरोना योद्धा घोषित नहीं किया गया है। सरकार ने जो थोड़ी बहुत कृपा दिखायी है, वो केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारों तक ही सीमित है, जबकि ये सर्वविदित सत्य है कि ऐसे गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की प्रदेश में ही नहीं देश में बहुतायत है, जिन्हें उनके संस्थान से नियुक्तिपत्र तो दूर परिचय पत्र तक भी मुहैया नहीं कराया जाता है।
कई मीडिया संगठन पिछले काफी समय से पत्रकारों को फ्रंटलाइन कर्मचारी घोषित कर उन्हें वैक्सीन लगाने की मांग कर रहे हैं, अब तक इस मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई है। महामारी की शुरूआत में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कर्मचारी घोषित कर उन्हें रिपोर्टिंग की इजाजत तो दी गई थी, लेकिन वैक्सीनेशन के मामले में उन्हें यह दर्जा नहीं दिया गया, जबकि उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक पत्रकारों की कोरोना संक्रमण से मौत हुई है। यूपी सरकार ने अब जाकर फैसला किया है कि पत्रकारों के लिए अलग वैक्सिनेशन सेंटर बनाये जायेंगे, जहां पत्रकार और उनके परिवारजनों को प्राथमिकता के आधार पर फ्री में कोरोना वैक्सीन लगेगी।
अब यूपी सरकार के नये आदेश में पत्रकारों को भी अन्य फ्रंटलाइन वर्कर की तरह से कोरोना कफ्र्यू में बिना ई-पास रिपोर्टिंग की इजाजत दी गयी है, जबकि इस बात की ओर किसी का ध्यान नहीं है कि कोरोना वायरस पत्रकारों के जीवन की सबसे बड़ी कहानी है और लोग हमसे उम्मीद कर रहे हैं कि हम इस दौर में उनके लिए हालात पर नजर रखें, खबरें देते रहें और खामियों को उजागर करते रहें। पत्रकार लगातार कोरोना का शिकार हो रहे हैं। खतरा सिर्फ वायरस तक सीमित नहीं है, पुलिस के डंडे, मुकदमे और नौकरी जाने का डर भी है। जानकारों की मानें तो पत्रकारों के लिए स्थानीय राजनीति, भ्रष्टाचार और अपराध जैसे मामलों की रिपोर्टिंग करना किसी युद्ध की स्थिति को कवर करने से भी ज्यादा खतरनाक है।
प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संदेश में दो बार कहा कि डाॅक्टरों, अस्पताल के कर्मचारियों, सरकारी अफसरों आदि की तरह मीडिया भी आवश्यक सेवाओं में शामिल है। मीडिया को आवश्यक सेवाओं में शामिल करना एक सुखद बदलाव है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर पत्रकारों को बाबा का ठुल्लू ही मिला है। ऐसा नहीं है सरकारों ने पत्रकारों की भलाई के लिए कई कदम उठाने की कोशिश की है, पर अनमने मन से। कुछ राज्य सरकारों ने पत्रकारों को कोरोना योद्धा मानने का साहस किया है, लेकिन उससे सम्बन्धित सुविधाओं का कहीं अता-पता नहीं है। यूपी में भी पत्रकारों के हित में स्थायी समिति बनायी गयी है, लेकिन अभी तक शायद ही किसी जनपद में इस स्थायी समिति ने पत्रकार हित में कोई तीर मारा हो। यदि सरकार चाहे तो पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित कर सकती है। ये किस तरह होगा, इसे सुझाने के लिए सरकारोें के पास पर्याप्त थिंक टैंक मौजूद है।

खतौली, उत्तर प्रदेश

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