करसोग के बेलर गांव में विराजमान है महामाया पांगणा

डा. हिमेन्द्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश की पावन भूमि का कण कण ईश्वरीय आभा से आलोकित है। हिमालय की तलहटी में स्थित हिमाचल वर्तमान में मानव सृष्टि के आदि पुरूष वैवस्वत मनु की वह स्थली है, जहां उतुंग पर्वत शिखर पर जल प्लावन के बाद सप्त ऋषियों सहित उनकी नाव को मत्स्यावतार धारी भगवान विष्णु ने नाव का बंधन किया था। यहीं हिमाचल के सुरम्य परिवेश में ऋषि मुनियों ने अपने तपोबल से मानव संस्कृति के आधार ग्रंथ वेदों का प्रणयन किया था। हिमाचल प्रदेश के हर घर गांव का सम्बंध किसी न किसी दैवीय शक्ति से अवश्य जुड़ा है और स्थूल रूप में अमुक दैवीय शक्ति का कोई पावन चबूतरा, विग्रह या पार्थिव स्वरूप आज पूजनीय है।

हिमाचल के गर्भ में अवस्थित मण्डी जिला वैदिक काल से तप:पूत मनीषियों की स्थली रहा है। मण्डी का नामकरण एक पौराणिक ऋषि माडव्य से हुआ माना जाता है। मण्डी के सुकेत क्षेत्र का नामकरण ऋषि ब्यास के पुत्र शुकदेव से निसृत माना जाता है। इसी सुकेत क्षेत्र में 765 ई. में कालकूट बंगाल से आये राजपुरूष वीरसेन ने सतलुज घाटी के पांगणा नामक गांव में सुकेत राज्य की नींव रखी थी।
पांगणा उप तहसील के पश्चिम में बेलर पंचायत के बेलर गांव में एक ऊंचे शिखर पर महामाया पांगणा कालकूट देवी भूवनेश्वरी का मंदिर अवस्थित है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर वीरसेन ने कालकूट अर्थात् कलकत्ता से आकर हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में एक राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से इस ओर प्रस्थान किया। शिमला-मण्डी की सीमा पर सतलुज के किनारे तत्तापानी (ज्यूंरी ) नामक स्थान पर वीरसेन ने नदी को पार कर यहां वैदिक ऋषि जमदग्नि के आश्रम में शरण ली थी। यहां से वीरसेन ने विजयाभिमान आरम्भ करते हुए बगशाड़ क्षेत्र के च्यांडी में पड़ाव डाला था। यहां भी वीरसेन ने दुर्ग बनाकर काली मां की स्थापना की थी। यहां से आगे बढ़ते हुए वीरसेन ने कुन्नों व नागड़ा के ठाकुरों को पराजित किया था। च्यांडी में आज भी वीरसेन के दुर्ग व यहां स्थापित काली मंदिर को देखा जा सकता है।

ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वीरसेन ने सरही के ठाकुर को पराज्त कर पांगणा में राज्य की स्थापना की थी, परन्तु हाल ही में स्थानीय मान्यताओं के आधार पर वीरसेन कुन्नो व नागड़ा के ठाकुरों को पराजित कर बेलर में रूके थे। बेलर में वीरसेन ने अपनी इष्टदेवी कालकूट की काली माता को इस टेकड़ी पर प्रतिष्ठित किया था। बारहवीं शताब्दी के इतिहासविद् धूरजट्ट की पुस्तक भार भाषणी के अनुसार वीरसेन ने पांगणा में साईबेरिया की बर्बर जाति डूंगर को कालकूट की महामाया देवी की शक्ति से नष्ट कर पांगणा में राज्य की स्थापना की थी. पांगणा में आज भी डूंगर जाति का अपभ्रंश डुंगरू गांव भी है। यहीं समीपस्थ देहरी में काली ने अपने प्राकट्य के द्वारा स्वयम् को प्रतिष्ठित किया था, परन्तु अद्यतन गवेषणा के आधार पर वीरसेन ने अपनी कुल देवी काली को साथ लेकर बेलर गांव की टेकड़ी पर स्थापित किया था। यहां मंदिर में माता महामाया का विग्रह स्थापित है। परिसर में शिवलिंग स्थापित है। यहीं परिसर में प्रस्तर आमलक हैं, जो इस बाद का द्योतक हैं कि यहां कभी प्रस्तर लघु मंदिर था जो वास्तुशिल्प की दृष्टि से सातवीं व आठवीं शताब्दी से सम्बंधित रहा होगा। एक प्रस्तर शिला के शीर्ष पर कामाख्या देवी का प्रजनन मुद्रा में चित्र उत्कीर्णित है, जो इस बाद का द्योतक है कि महामाया कामाख्या रूप में तंत्र परम्परा से यहां प्रतिष्ठित है। जिस टेकड़ी पर महामाया प्रतिष्ठित है, उस स्थान का नाम देहरी है। यही नाम वीरसेन ने बेलर से जाकर पांगणा में उस स्थान को दिया था, जहां महामाया काली रूप में प्रतिष्ठित है।


अत: यहां विद्यमान पुरातात्विक व लोकश्रुत साक्ष्यों के आधार पर वीरसेन ने अपने विजयाभियान के समय कुन्नो व नागड़ा के बाद बेलर में कुछ समय तक रूक कर यहां दुर्ग व महामाया के मंदिर का निर्माण किया होगा। बेलर के बाद वीरसेन ने सरही के ठाकुर को पराजित कर पांगणा में सेन वंश के राज्य की स्थापना की थी। मंदिर के परिसर में स्थापित शिवलिंग का प्रादुर्भाव के पीछे एक रोचक मान्यता जुड़ी है। एक बार गांव के एक किसान की गाय इसी टेकड़ी पर किसी झाड़ी में जाकर दूध का त्याग करती थी। जब किसान ने स्वयं इस अलौकिक दृश्य को देखा तो उसने गांव वालों को साथ लेकर उस स्थान पर खुदाई की। खुदाई में एक शिवलिंग आविर्भूत हुआ। यह शिवलिंग खुले आकाश के नीचे विराजमान है, जो अपनी दिव्यता से परिवेश को आलोकित करता है।

सन् 1993 में जब इस स्थान के जीर्णोद्धार का कार्य आरम्भ होना था तो यहां के किसी व्यक्ति में हनुमान का प्रवेश हुआ, जिसने यहां शिव शक्ति की प्रतिष्ठा होने का रहस्योदघाटन किया था। अत: यहां मिली प्रस्तर मूर्तियों में भगवान शिव हाथ में शूल धारण किए विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त कई अन्य मूर्तियां द्रारपाल की हैं। वस्तुत: बेलर गांव के देहरी स्थान पर अवस्थित महामाया मंदिर सुकेत रियासत की स्थापना से पूर्व संस्थापक वीरसेन की अल्पकालिक राजधानी अवश्य रही है। इसी गांव के समीप मही गढ़ एक ऐसा अलौकिक गढ़ है, जो समतल स्थान पर बना है, जो समतल भूमि पर बना होने के बावजूद आगंतुकों के लिए अदृश्य है। मही का स्थानीय बोली में अर्थ समतल स्थान है। अत: भौगोलिक विशेषता के कारण ही गढ़ का नाम मही पड़ा है। गढ़ में मही देव प्रतिष्ठित हैं, जिनकी क्षेत्र में बड़ी मान्यता है। बेलर गांव में स्थापित यह गढ़ वीरसेन द्वारा पांगणा में राजधानी स्थापित होने के बावजूद सामरिक दृष्टि से कालांतर में भी महत्वपूर्ण रहा होगा। बहरहाल बेलर गांव के देहरी में स्थापित महामाया पांगणा का मंदिर जिसे भीमाकाली भी कहते हैं, रियासती इतिहास और सांस्कृतिक जीवन का संवाहक रहा है।

इतिहासकार व साहित्यकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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