शिवपुराण से……. (287) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

कामदेव के नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र-वसिष्ठ मुनि का चन्द्रभाग पर्वत पर उसका तपस्या की विधि बताना……………….

गतांक से आगे………..

वह संध्या, जो पहले मेरी मानस पुत्री थी, तपस्या करके शरीर को त्याग कर मुनिश्रेष्ठ मेधातिथि की बुद्धिमती पुत्री होकर अरून्धती के नाम से विख्यात् हुई। उत्तम व्रत का पालन करके उस देवी ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के कहने से श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठ को अपना पति चुना। वह सौम्य स्वरूपवाली देवी सबकी वन्दनीया और पूजनीया श्रेष्ठ पतिव्रता के रूप में विख्यात् हुई।
नारदजी ने पूछा-भगवन् संध्या ने कैसे, किसलिए और कहा तप किया? किस प्रकार शरीर त्यागकर वह मेधातिथि की पुत्री हुई? ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीनों देवताओं के बताये हुए श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठ को उसने किस तरह अपना पति बनाया? पितामह! यह सब मैं विस्तार के साथ सुनना चाहता हूं। अरून्धती के इस कौतूहलपूर्ण चरित्र का आप यथार्थ रूप से वर्णन कीजिये।
ब्रह्माजी ने कहा-मुने! संध्या के मन में एक बार सकाम भाव आ गया था, इसलिए उस साध्वी ने यह निश्चय किया कि वैदिक मार्ग के अनुसार में अग्नि मे अपने इस शरीर की आहूति दूंगी। आज से इस भूतल पर कोई भी देहधारी उत्पन्न होते ही काम भाव से युक्त न हो, इसके लिए मैं कठोर तपस्या करके मर्यादा स्थापित करूंगी।

(शेष आगामी अंक में)

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