कोरोना की द्वितीय लहर: जरूरतें कम करें, धैर्य के साथ अपना व अपनों का ख्याल रखें

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कोरोना की द्वितीय लहर ने ऐसा कहर बरपाया है कि चारों ओर त्राहिमाम-त्राहिमाम मची है। कोरोना की प्रथम लहर से भारत जीता था और इस बार भी महामारी से हम निश्चित ही फिर से जीतेंगे। प्रथम बार भारत में कोरोना ने इतना कहर नहीं ढाया था, जितना पुलिसिया अत्याचार व राजनेताओं की अदूरदर्शिता ने ढाया था। हमारे यहां के नीति निर्माताओं ने पिछले वर्ष की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा। अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए तमाम मदारी वाली हरकतें करते रहे। वैक्सीन को लेकर जो नौटंकी मीडिया पर चली, उससे दुनिया ने खूब मनोरंजन किया। दुनिया के अधिकांश देश अपने यहां की चिकित्सकीय सुविधाओं को बढ़ा रहे थे तब भारत की वर्तमान सरकार आंख, नाक, कान बंद करके राज्यों में सरकार बनाने के लिए विधायकों -सांसदों की बोली लगा रही थी ।

आज देख लो कोरोना की द्वितीय लहर ने वो कहर ढाया है कि शमशानों में लाशें जलाने के लिए जगह नहीं है। अस्पतालों में मरीजों को रखने के लिए जगह नहीं है। सोशल मीडिया पर देखो चारों ओर दिल दहला देने वाले मंजर सामने आ रहे हैं। सरकार अपनी विफलता को छिपाने के लिए लॉक डाउन को विकल्प मानकर पुनः लगाने की कोशिश कर रही है। लॉकडाऊन से गरीब मर जाएंगे और भारत गरीबों का देश है। घटती इम्युनिटी भी कोरोना को बढ़ावा दे रही है। इसके साथ हमारे यहां लोग लापरवाह भी बहुत हैं। मास्क लगाना नहीं चाहते, शादी -व्याह जैसे प्रोग्राम रोकना नहीं चाहते, साफ- सफाई पर कुछ खास ध्यान देना नहीं चाहते। कोरोना के टीके को लेकर तमाम तरह की अफवाहें फैल चुकी हैं। ठीक वैसे ही जैसे पिछले साल टीन-टप्पर, थाली-ताली बजाने जैसे फूहड़ टोटके इंडिया के बड़े-बड़े लोगों ने किये।

देश चलाने वाले चुप हैं। अपनी राजनैतिक क्रियाओं में व्यस्त हैं। देश-दुनिया में और भी तमाम तरह की बीमारियां हैं, लोग उनसे भी मरते थे, पर आज मरे कैसे भी पुष्टि सिर्फ कोरोना की होती है। हमारे यहां लोग कोरोना को भुना भी बहुत अच्छे से रहे हैं। पांच का सामान पचास में बिक रहा है। भारत में हर चीज में कोरोना है, सिर्फ रुपयों को छोड़कर। भ्रष्टाचारी लाखों रुपए ऐसे पचा लेते हैं कि एक डकार तक नहीं लेते। पुलिस-प्रशासन सबसे कमाऊ धंधा है। भारत में सबसे कमाऊ नौकरी पुलिस की है और पुलिस को यह उपाधि चंद खाकी की दलाली खाने वालों ने दिलवाई है। वैसे सारा पुलिस डिपार्टमेंट भ्रष्टाचारी नहीं है। कुछ ईमानदार, वर्दी के वफादार अधिकारी भी हैं, जिनके दम पर ही कानून व्यवस्था कायम है। इसके साथ ही फौज सबसे सम्मानित नौकरी है, लेकिन सबसे बड़ा हास्य विषय यह है कि सबसे अधिक गाली पुलिस को ही पड़ती है और सबसे अधिक गाली भी पुलिस ही देती है। कोरोना काल में मैंने बहुत नजदीक से देखा है। सरकारी नौकरी वाला चाहता है कि लॉकडाऊन कभी खत्म ही न हो। मेरी जान-पहचान का एक सरकारी अध्यापक है। वेतन पचास-साठ हजार रुपए मासिक। कुकुर का नाती एक दिन कह रहा था मौज आ रही है। महीना होते ही मोबाइल बज उठता है अपना तो, ईश्वर करे ऐसे ही लॉकडाऊन लगा रहे। कोरोना ने स्वार्थी रिश्तों की भी पोल खोल कर रख दी है। जो भ्रष्टाचारी संकट की इस घड़ी में भी लूट रहे हैं, वे समाचार देखें कि कैसे मरने पर अपने ही मुंह मोड़ रहे हैं, इसलिए आदमी से इंसान बन जायें।

साथियों! संक्रमण को रोकने के लिए दो गज की दूरी और मास्क लगायें। हाथ धोते रहें, घर से कम ही निकलें। इससे डबल फायदा है, पुलिस के कहर से बचेंगे और कोरोना से भी। जरूरतें कम करें। धैर्य के साथ अपना व अपनों का ख्याल रखें…।

ग्राम रिहावली डाक तारौली गुजर, फतेहाबाद (आगरा) उत्तर प्रदेश

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