शिवपुराण से……. (285) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

कामदेव के नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र-वसिष्ठ मुनि का चन्द्रभाग पर्वत पर उसका तपस्या की विधि बताना……………….

गतांक से आगे………..

कामदेव! मेरे शरीर से उत्पन्न हुई मेरी यह कन्या सुन्दर रूप और उत्तम गुणों से सुशोभित है। इसे तुम अपनी पत्नी बनाने के लिए ग्रहण करो। यह गुणों की दृष्टि से सर्वथा तुम्हारे योग्य है। महातेजस्वी मनोभव! यह सदा तुम्हारे साथ रहने वाली और तुम्हारी रूचि के अनुसार चलने वाली होगी। धर्मतः यह सदा तुम्हारे अधीन रहेगी।
ऐसा कहकर दक्ष ने अपने शरीर से पसीने से प्रकट हुई उस कन्या का नाम रति रखकर उसे अपने आगे बैठाया और कंदर्प को संकल्प पूर्वक सौंप दिया। नारद! दक्ष की वह पुत्री रति बड़ी रमणीय और मुनियों के मन को भी मोह लेने वाली थी। उसके साथ विवाह करके कामदेव को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी रति नामक सुन्दरी स्त्री को देखकर उसके हाव-भाव आदि से अनुरक्तित हो कामदेव मोहित हो गया। तात! उस समय बड़ा भारी उत्सव होने लगा, जो सबके सुख को बढ़ाने वाला था। प्रजापति दक्ष इस बात को सोचकर बड़े प्रसन्न थे कि मेरी पुत्री इस विवाह से सुखी है। कामदेव को भी बड़ा सुख मिला। उसके सारे दुख दूर हो गये। दक्षकन्या रति भी कामदेव को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। जैसे संध्याकाल में मनोहारिणी विद्युत्माला के साथ मेघ शोभा पाता है, उसी प्रकार रति के साथ प्रिय वचन बोलने वाला कामदेव शोभा पा रहा था।

(शेष आगामी अंक में)

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