शिवपुराण से……. (286) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

कामदेव के नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र-वसिष्ठ मुनि का चन्द्रभाग पर्वत पर उसका तपस्या की विधि बताना……………….

गतांक से आगे………..

इस प्रकार रति के प्रति भारी मोह से युक्त रति पति कामदेव ने उसे उसी तरह अपने हृदय के सिंहासन पर बैठाया, जैसे योगी पुरूष योगविद्या को हृदय में धारण करता है। इसी प्रकार पूर्ण चन्द्रमुखी रति भी उस श्रेष्ठ पति को पाकर उसी तरह सुशोभित हुई, जैसे श्रीहरि को पाकर पूर्णचन्द्रानना लक्ष्मी शोभा पाती है।
सूतजी कहते हैं-ब्रह्माजी का यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् शंकर का स्मरण करके हर्षपूर्वक बोले-महाभाग! विष्णुशिष्य! महामते! विधातः! आपने चन्द्रमौलि शिव की यह अद्भुद लीला कही है। अब मैं यह जानना चाहता हूं कि विवाह के पश्चात् जब कामदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थान को चला गया, दक्ष भी अपने घर को पधारे तथा आप और आपके मानसपुत्र भी अपने-अपने धाम को चले गये, तब पितरों को उत्पन्न करने वाली ब्रह्मकुमारी संध्या कहां गयी? उसने क्या किया और किस पुरूष के साथ उसका विवाह हुआ? संध्या का यह सब चरित्र विशेषरूप से बताइये।
ब्रह्माजी ने कहा-मुने! संध्या का वह सारा शुभ चरित्र सुनो, जिसे सुनकर समस्त कामिनियां सदा के लिए सती-साध्वी हो सकती हैं।

(शेष आगामी अंक में)

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