सत्यनारायण चालीसा

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सतनारायण की कथा, व्रत पूजन गुणगान।
इस्कंद रेवा खंड में, कहत हैं कवि मसान।।

सतनारायण जयजय स्वामी।
तुम सुखदाता जग कल्याणी।।1
धरती पर नारद मुनि आये।
सारे मानव दुखिया पाये।।2
फिर विष्णु से हाल सुनाया।
तब प्रभु नारद भेद बताया।।3
पांच पाठ की कथा पुरानी।
सूत मुनी ने करी बखानी।।4
इक सौ सत्तर श्लोक सुनाये।
हिन्दी में भी सब समझाये।।5
नैमिष वन में आश्रम एका।
रहते मुनिगण शिष्य अनेका।।6
शौनक मुनि को गुरु समझाया।
सतनारायण भेद बताया।।7
स्कंद पुराणा रेवा खंडा।
पंचाध्यायी सुनते संता।।8
प्रथम पाठ पूजन विधि आया।
कथा महत्तम भी बतलाया।।9
केला पत्ते फल पंचामृत।
पान सुपारी रोली तिलघृत।।10
दूध मधू गंगाजल केला।
पंचामृत मेंवा भी मेला।।11
शक्कर आटा सेक मिलाते।
पंजरी का प्रसाद बनाते।।12
दूजे की अब सुनो कहानी।
बूढ़ा बामन काशी आनी।।13
खाने पीने के भी लाले।
कठिनाई से समय निकाले।।14
मनुष रूप धरि प्रभुजी आये।
शतानंद पूजन समझाये।।15
जब पंडित ने पूजन कीना।
विधी पूर्वक व्रत को लीना।16
लकड़हार को भी समझाया।
बेची लकड़ी दाम कमाया।17
फिर उसने पूजन करवाये।
पाड़ पडोसी सब बुलवाये।।18
देखो प्रभु की ऐसी माया।
निर्धन से धनवान बनाया।।19
पूरे जीवन कथा कराई।
अंत समय बैकुंठ सिधाई।।20
अब तीजे की बारी आई।
उल्कामुख राजा सुखदाई।।21
हर पूनम को कथा कराता।
नियमआरती भोग लगाता।।22
साधु नाम व्यापारी देखा।
फिर पूजन विधि उसने लेखा।।23
करी कमाई घर को धाई।
पत्नी को सब बात बताई।।24
फिर उसने संकल्प कराया।
दसवें महिने बेटी पाया।।25
कलावती कन्या कहलाई।
लीलावति की गोद भराई।।26
व्यापारी फिर लोभ दिखाया।
बार बार पूजन टलवाया।।27
समय पाय बेटी को ब्याही।
सुंदर जामाता भी पाई।।28
बढ़ता धंधा खूब कमाई।
गदगद होते ससुर जमाई।।29
डूबी नाव वैश्य घबराया।
घर आकर पूजन करवाया।।30
अब चौथे की सुनो कहानी।
फिर संयासी दंडी बनआनी।।31
भरा माल नौका दिखलाया।
लता पात बनिया बतलाया।।32
तथास्तु कह यति कीन पयाना।
सांची वाणी को जब जाना।।33
चरण लाग के माफी मांगा।
माया घमंड सारा भागा।।34
तुरत कथा की याद दिलाई।
घर आकर पूजा करवाई।।35
ग्वालों ने भी कथा कराई।
राजा तुंग प्रसाद न पाई।।36
जब राजा ने ठोकर खाया।
छमा मांग के पलक लगाया।।37
पांचम पाठ अंतिम भाई।
सार सार सब कही सुनाई।।38
शतानंद फिर भये सुदामा।
उल्कामुख बन दशरथनामा।।39
साधू मोरध्वज कहलाये।
तुंगध्वज भी सुंदरजस पाये।।40

यह चालीसा सार है,कर पूजन उपवास।
कलयुग की तो नाव है,सत का ही विश्वास।।

23, गवलीपुरा आगर, (मालवा) मध्यप्रदेश

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