सकल घरेलू उत्पाद का 8% स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च हो

आशुतोष झा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भारत दुनिया के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे कम खर्च करती है। हमारे यहां जीडीपी का मात्र 1•२% ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। वक्त आ गया है कि अब इसमें अच्छी खासी बढोतरी की जाय। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने तो राज्य सरकारो को 8-10% तक बजट में खर्च करने की बात कही है, जो औसतन 4-5% ही खर्च कर पाते हैं।

आज स्वास्थ्य सेवाओं का चरमराना आम लोगो पर भारी पड़ रहा है। बैड, वेंटिलेटर, आईसीयू, दवाएँ और ऑक्सीजन जैसी जरूरी सामान की किल्लत ने न जाने कितने ही परिवारों को निगल चुकी है। अच्छी स्वास्थ्य सेवा का होना अनिवार्य है, जो सरकारें ही सुनिश्चित कर सकती है। सरकारो को जात-पात, आरक्षण से परे हटकर दायरा बढाना होगा। आज चारो तरफ किल्लत ही किल्लत है, आखिर क्यूँ? क्या बजट के प्रावधानों में स्वास्थ्य की अहमियत नही रही? आखिर कब तक सरकारे सिर्फ जात-पात और सब्सिडी बांटने पर अपना ध्यान और क्षमता को केन्द्रित करती रहेंगी? देश की स्वास्थ्य और उनसे जुड़े हुए सारी सेवा को चाक-चौबंद करना ही होगा और बजट के दायरे को बढाये वगैर ऐसा संभव नहीं है। इस महामारी काल ने हमारे सफेद पोश के सफेद झूठ की पोल इस तरह खोली है कि चारो ओर चीख-पुकार सुनने को मिल रही है। क्या यही अच्छे दिन की परिभाषा है या फिर सरकारों की मनमौजी। आखिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की बातों को अनदेखी क्यों हो रही है। जब हम स्वस्थ्य ही नही रहेंगे तो एक रूपये गेहूँ और एक रूपये चावल बांटने की नीति का क्या करेंगे?

वैसे देखा जाय तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अमूल्य परिवर्तन हुए हैं, लेकिन यह सिर्फ चंद शहरो तक सीमित हैं, जबकि ग्रामीण स्तर पर या फिर जिला स्तर पर यह परिवर्तन होनी चाहिए, जो सिर्फ और सिर्फ बातो से नही अपितु जमीनी स्तर पर करना ही होगा। वैसी कार्य प्रणाली और सेवा प्रणाली को सुदृढ करना होगा, जो स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यो को जिम्मेदारीपूर्वक करें। सभी सरकारों को स्वास्थ्य के लिए पहली प्राथमिकता के साथ तवज्जो देनी होगी और समस्याओ के निदान कर्मठ व योग्य चिकित्सको को लाना होगा। इन सभी कार्यो को तभी अमलीजामा पहनाया जा सकता है, जब बजट हो और उसका इस्तेमाल सही तरीके से हो।

हम आबादी के हिसाब से भी देखे तो एक वेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए 2500 से 5000 की आबादी पर एक डाक्टर और एक नर्स का होना अनिवार्य माना जाएगा, लेकिन जब हम ऑकडो पर आते है तो ग्रामीण क्षेत्रो में यह 50000 और शहरी क्षेत्रों में 25000 पर पहुँच जाता है, ऐसे में एक अच्छी स्वास्थ्य सेवा का सपना देखना लोगो पर भारी पड़ रहा है और सरकारें विकास का वखान करती नजर आ रही हैं, जबकि हकीकत सबके सामने है। संविधान का 74वां संशोधन कहता है कि नगर निगम और नगरपालिका जैसे स्थानीय शहरी निकायों का कर्तव्य है कि वे शहरी क्षेत्र में प्राथमिक और व सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करावें। स्वास्थ्य के लिए हर किसी की प्राथमिकता देनी होगी, चाहे वह पंचायत प्रतिनिधि हो विधायक हो सांसद अथवा मंत्री।

आज यह महामारी हमारी सिस्टम और प्रचारित कार्यप्रणाली की कलई खोल रही है और सभी मूकदर्शक बने हुए है, जबकि जिन्दगी दम तोड़ने पर विवश है। कोई बेड खोज रहा, कोई ऑक्सीजन, कोई डाक्टर, कोई अस्पताल, कोई एम्बुलेंस, तो कोई श्मशान। हिन्दुस्तान ऐसा विवश और लाचार कभी नही दिखा। इस महामारी ने सबको लाचार बना डाला है, चाहे वह सरकारें हो या आम जनता।

पटना, बिहार

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