मैं वापस आऊंगा

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कोरोना थोडा सा विश्राम के मूड में क्या हुआ, भारत में उन्माद का जश्न और लाकडाउन काल की पाबन्दियों को जैसे पर लग गये। प्रकृति के साथ सदैव से खेलता आया मानव अदृश्य वायरस के सम्मुख आज फिर निःसहाय लाचार पंगु और बौना दिखा। फिल्मी विलेन जैसा मार खाकर, शक्ति अर्जित कर पुनः मैदान में उपस्थित हुआ कोरोना आज अपनें उग्रता और चर्मोत्कर्ष की वजह से सरकारी तंत्र के लिये भी भीषण चुनौती प्रस्तुत कर चुका है। स्वास्थ्य संस्थायें और हमारे पृथ्वी के भगवान कहे जानें वाले डा.वर्ग भी इसकी लहर की प्रचंडता के आगे घुटनें टेकने को मजबूर हो गये हैं, क्योंकि इतनी उग्रता और संख्यागत मरीजों की कल्पना वे भी नहीं कर पाये थे। काल का परम मित्र और मानव जाति के विनाश के इस बीज का फिलहाल अंत असंभव दिख रहा है। इस बार इसने रुख बदलनें के साथ हीं तमाम तरह के नये नये आयामों को अपने स्वभाव में गढ लिया है। सच्चाई से यदि पूरे देश की जनसंख्या का कोरोना टेस्ट कर लिया जाय तो आज के तारीख में आधी जनसंख्या इसकी चपेट में आ चुकी है। हमारे मुख्यमंत्री के साथ हीं अधिकतर अधिकारी वर्ग इस संक्रमण से संक्रमित और होम क्वारंटाईन हो चुके हैं।
              कहते है कि शिक्षा मनुष्य को सशक्त करती है और आज विकास का हर एक ईंट इसका गवाह है, पर विकास की बुनियाद में प्रकृति दोहन की असहनीय पीडा को क्या शिक्षित वर्ग महशूस कर सका या देख पाया? अतिशिक्षित और विकसित विद्वानों के लैब से हीं इस महाअसुर कोरोना ने आज प्रकट होकर मानव सभ्यता को समूल नाश करने का बीडा उठा लिया है। चीन आज उतना परेशान नहीं है। यूरोप भी पहले की विभिषिका में नहीं आ पाया है, लेकिन भारत की अखंड जनसंख्या के कठपूतलियों ने खुद को कोरोना के हाथ में फिर से अपनी डोर सौंप दी है। लो नचाओ हम सदियों से गुलामी के हकदार और आदती।
              आज देश के कर्णधारों ने भी शायद राजधर्म की परिभाषा बदल ली है। सत्ता की चकाचौंध मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं पर भारी है, वर्ना इस विषम कालजनित परिस्थिति में राज्यों और ग्रामीण अंचलों में लोकतंत्र के पर्व चुनाव का आयोजन इस बीमारी के लिये एक महा उत्सव से कम नहीं। गली-गली में लोकतंत्र नंगा होकर अपनें वोट के लिये खुद को बेंचते-बेंचते बेजान हो चुका है और उम्मीदवार खरीदते खरीदते पूरी तरह धराशायी। कुछ कागजी नोट व नशा की खुराक के बदले पांच साल का शासकीय पट्टा। चुनाव उपरांत भगवान न करें अधिकतर उम्मीदवार और मतदाता चाहे जिस भी चुनाव क्षेत्र के हों, विधानसभा से लेकर क्षेत्र पंचायत तक, सब अस्पतालों के बेड पर हों और डा. बेचारे पोलिथीन की वर्दी में उनकी भयंकर बिमारी के रुदन को अपने आंसुओं और पसीने से सींचे और शासन वर्ग सम्पूर्ण लाकडाउन लगाकार गरीब, मजदूर, व्यापारी को मानवता का पाठ पठाते दिखें। जिस देश में शिक्षण सम्बंधित समस्त उपक्रमों को आज सम्पूर्ण रुप से प्रतिबंधित कर दिया गया है, उस देश में चुनाव से बढकर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? आगे मनुष्य की अनंत गलतियों की जिम्मेवारी के लिये एकमात्र दोषी भगवान हैं न।
ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश

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