कुमारसैन क्षेत्र की प्रतिष्ठित आदि शक्ति कचेड़ी

डा. हिमेन्द्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

पश्चिमी हिमालय के मध्य हिमालय पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत हाटू पर्वत के अंचल में अवस्थित आदि शक्ति कचेड़ी कुमारसैन की प्रतिष्ठित शक्ति स्वरूपा देवी है। राष्ट्रीय मार्ग पाच पर ओडी नामक स्थान के दायीं ओर सघन देवदार के मनोहारी वन के मध्य स्थित देवी का सतलुज शिखर शैली में बना आदि मंदिर कुमारसैन के सलाट क्षेत्र के धर्म-आस्था के केन्द्र में है। समुद्र तल से लगभग साढ़े छ: हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित आदि शक्ति कचेड़ी का देवालय आगन्तुकों के निरन्तर शरणागति का केन्द्र बना रहता है। सैधव सभ्यता के स्थलों की खुदाई में देवी की प्रतिमाओं के मिलने से यह प्रमाणित होता है कि मानव ने सर्वप्रथम दृश्यमान प्रकृति की पूजा व उसके दैवीकरण की परिकल्पना प्रतिष्ठित की। उस काल में प्रकृति की दैवीय शक्ति रूप में पूजा परिपाटी ईरान से लेकर एजियन सागर के सभी देशों में प्रचलित थी। इस प्रकृति पूजा की परिपाटी भारत में शक्ति पूजा के रूप में विकसित हुई। ऋग्वेद में श्रद्धा, इडा़, शची, वरूराणी, अदिति, ऊषा, मति, धी व सरस्वती आदि देवियों का वर्णन सन्निहित है। बौद्ध और जैन घर्म में क्रमश: तारा और श्यामा देवियों की पूजा का विधान है। वास्तव में जालन्धर पीठ अर्थात् हिमाचल स्वयम् में शक्तिपीठ है। कलियुग के आरम्भ में सभी देवी – देवता और तीर्थ त्रस्त थे कि अपनी अक्षुणता और पावनता कैसे  सुनिश्चित करे। अत: वे सब शक्ति की शरण में गए। शिव ने उन्हे सुझाव दिया कि जालन्धर क्षेत्र तीर्थों और देव स्थानों में श्रेष्ठ है। अत: यहां आकर निवास करो। यहां तुरन्त पाप हरने वाली पावनी ब्यास नदी है। सद्य सिद्धि प्रदायनी चण्डिका, बज्रेश्वरी, चामुण्डा और ज्वालामुखी है।
हिमाचल में हालांकि देवी पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है. शिमला जिले की सतलुज घाटी में वैष्णव देवी की पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है. हिमाचल में वैष्णव देवी उषा देवी प्रतीत होती है. उखा नाम से उपासित इस देवी के मंदिर सतलुज घाटी के अन्तर्गत किन्नौर जिले के कोठी,निचार व सांगला और शिमला के सराहन व रामपुर में हैं.
हिमाचल पवर्तराज हिमालय का ही प्रतिरूप है. यहीं जलप्लावन के बाद सप्तऋषियों सहित मनु की नाव हिमालय के किसी गिरि मुक्ट पर बांधी गई. कालांतर में यहीं तपकर मनु ने सृष्टि का आरम्भ किया. सतलुज घाटी में रामपुर बुशैहर से नीचे निरमण्ड अर्थात् श्री पटल की माता अम्बिका, सतलुज के किनारे पूर्ववर्ती कुमारसैन रियासत के सतलुज पार बाहरी सराज की आदि शक्ति माता कुसुम्भा और कुमारसैन क्षेत्र की आदि शक्ति कचेड़ी सतलुज घाटी के प्रमुख शक्ति स्थल हैं.
आदि शक्ति कचेड़ी का भण्डार शैली का मंदिर कचेड़ी गांव में अवस्थित है. माता कचेड़ी के इस क्षेत्र में प्राकट्य के विषय में कई आख्यान प्रचलित हैं. आदि शक्ति की घडा़सन अर्थात् भार्था में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख आता है कि पांडवों ने ने भी आदि शक्ति को प्रसन्न कर महाभारत युद्ध में अपनी विजयश्री का वरदान मांगा था. आदि शक्ति कचेड़ी के इस क्षेत्र में प्राकट्य के विषय में एक आख्यान है कि कचेड़ी का सकटेड़ु पुजैरा लगभग सवा सौ पीढ़ी पूर्व काशी से आकर पब्बर घाटी मे स्थित विराट नगर हाटकोटी में रहने लगा. उस सकटेड़ु वंश का एक व्यक्ति कालांतर में कचेड़ी आकर कर बस गया. वह ब्राह्मण अपने साथ तुम्बी में आदि शक्ति भगवती,इसकी बहिन व महादेव कोटेश्वर को  बंद कर ले आया और इन्हे सतलुज नदी में प्रवाहित करने के प्रयोजन से नदी की ओर उतरा. जब वह सकटेड़ु सतलुज नदी से दो किमी ऊपर पहुंचा तो देव कृपा से पांव फिसलने के कारण तुम्बी फट गई और महादेव कोटेश्वर समीपस्थ बणा और भेखल की झाड़ी में प्रविष्ट हो गए.एक माता आकाश मार्ग से ओडी के समीप घमाना गांव की चोटी टिक्कर पर चली गई. यहां माता ने कैल के वृक्ष में अपना निवास बनाया. यहीं माता लिंग रूप में प्रतिष्ठत हुई. वहीं दूसरी बहिन आकाशीय विहार कर सतलुज पार बाहरी सराज के खेगसू में प्रतिष्ठित हुई. टिक्कर में रह रहे पूर्ववर्ती आर्य वंशज मवाना को अपनी विद्यामानता के विषय में स्वप्न में दर्शन दिए. परिणामस्वरूप श्रद्धानवत मवाना ने मां के लिंग विग्रह को मदिर बनाकर प्रतिष्ठित किया.

एक अन्य लोक आख्यान के अनुसार आदि शक्ति विराट नगर हाटकोटी से यहा आकर प्रतिष्ठित हुई. परन्तु जब ब्राह्मण ने कोटेश्वर महादेव को तुम्बी में बंदकर हाटकोटी से चलकर तुम्बी को सतलुज में फैकना चाहा तो वहां से दो देवी मातृकायें ब्राह्मण के आगे पीछे  इस प्रयोजन से चलने लगी कि वे अवसर मिलने पर महादेव को बंद तुम्बी से मुक्त कर सके. जब पड़ोईबील में ब्राह्मण को देवयोग से ठोकर लगने से तुम्बी फट गई तो महादेव झाड़ी में अंतर्धयान हो गए. दोनों बहनें आकाश मार्ग से रचटाड़ी गांव पहुंची और यहां से हाटू चोटी पर रूकीं. एक माता यहीं प्रतिष्ठित हुई.जबकि कचेड़ी देवी ओडी के समीप टिक्कर चोटी पर रहने लगी. टिक्कर के समीपस्थ भूरिया नाम का शक्तिशाली मवाना था.माता के स्थान पर रहने के कारण उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. परेशान भूरिया मवाना ने ब्राह्मणों से सलाह लेकर कुंवारी कन्याओं को बुलाकर उनमें आर्त मन से माता का आह्वान किया. भूरिया ने कहा कि जिस कारण उसे घोर विपदा का सामना करना पड़ रहा है क्या वह देवी-देवता है या राक्षस?  कन्याओं में से एक लड़की में तभी आवेश  के साथ शक्ति का स्फुरण हुआ.  देवारोहण के उन्मांद में लड़की नृत्य करने लगी. लड़की कहने लगी कि भगवती माता टिक्कर चोटी पर लिंग रूप में पड़ी है. दो मातायें  एक कण्डा और दूसरी मुण्डा अर्थात् अंचल में यहां स्थित हैं. मवाना और ब्राह्मण ने माता के यहां निवास करने के विषय में जानकारी न होने के कारण उन्हे क्षमा करने की प्रार्थना की और माता के लिए मंदिर बनाने का संकल्प लिया.आवेश में आई लड़की तत्क्षण  टिक्कर चोटी पर गई और उस स्थान को चिन्हित किया जहां माता पिंडी रूप में भूमिगत पड़ी थी. निर्देशित स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया जिसे मातृ देऊरी कहते हैं.
एक अन्य लोकश्रुत परम्परा माता कचेड़ी के प्राकट्य की कहनी कुछ अलग तरह से व्याख्यायित करती है. इस मान्यता के अनुसार  माता कचेड़ी माता कुसुम्भा व हाटकोटी सहित सप्त देवी सप्त वसुधरा के नाम से प्रसिद्ध हैं. इन्हे सात भराड़ी माता नाम से भी जाना जाता है जिनका जन्म खेगसू माता के नदी पुल के पास बाड़ा कुई स्थान पर हुआ. ये सप्त भराड़ियां बाहरी सराज के चार चम्बू देवताओं की बहनें मानी जाती हैं. ये सात बहने चड़ाकोट से सतलु ज की ओर उड़ीं और कुमारसैन के ओडी के पास कचेड़ी के जंगल में स्थित हुई. हिंहलाज से भ्रमण करते महादेव कोटेश्वर हाटकोटी होते कोटी नामक स्थान पर विराजमान हुए. उधर गया से आया राजकुमार कीर्ति सिंह ने माता को अपना इष्ट माना.
एक बार तीर्थ यात्रा से लौटा लाठी का शिर्कोटू ब्राह्मण रात को माता के मंदिर में रूका तो उसको किसी अदृश्य शक्ति ने तंग किया. तंत्र विद्या निष्णात उस ब्राह्मण ने शाबर मंत्र की शक्ति से  देवी को पानी की तुम्बी में बंद कर दिया .तुम्बी को लेकर वह ब्राह्मण माताओं  को सतलुज में फैकने के प्रयोजन से नीचे की ओर बढ़ा. देवियों ने स्वयम् को मुक्त करने के लिए कोटेश्वर महादेव को कहा. महादेव के प्रताप से ब्राह्मण को सतलुज की ओर चलने पर अंधेरा और ऊपर की ओर चलने पर उजाला दिखाई देने लगा. हठीले ब्राह्मण ने सभी अलौकिक शक्तियों के प्रतिरोध के बावजूद सतलुज की ओर प्रस्थान किया. अत: कराड़ी की धार परूआ के पास पैर फिसलने से तुम्बी फट गई. तुम्बी में से तीन देवियां निकलीं .महाकाली उड़ कर हाटू नामक चोटी पर स्थित हुई. दूसरी देवी महासरस्वती उड़कर लूहरी से ऊपर पांजवी नामक वन में स्थित हुई. महालक्ष्मी अपने पुराने स्थान कचेड़ी में स्थापित हुई. हाटू की कालका अपनी तीन सहेलियों के साथ दो बार सतलुज के किनारे आई. इस दैवीय  घटना को लोक गीत में इस प्रकार गाया गया है:
हाटू कालके केपू खेखरा शांह दी आई,
राम सिंह राणेये धाना रूंवदी लौंदी लाई.
खेखर वाले संवाणे अर्थात् सीढ़ी के मंझकी देवरी से जब उस महाकाली ने अपनी सहेलियों के साथ ऐसा लामण गाया तो राणा ने क्षमा मांगने के लिए उस खेत में कई बकरे काटे. जब राष्ट्रीय मार्ग का निर्माण हो रहा था तो माता कचेड़ी ने कई चमत्कार दिखाए. सोए हुए मजदूरों के बीच एक बड़ा गिद्ध आया जिसे देखकर कई मजदूर अचेत हो गए.
माता कचेड़ी के कुमारसैन में प्राकट्य के विषय में एक अन्य आख्यान बाहरी सराज में भी प्रचलित है. इसके अनुसार विराट नगर हाटकोटी में चार कुंवारी बहनें रहतीं थीं.साधु भेषधारी एक दैत्य ने कन्याओं का पीछा किया.एक बहन हाटकोटी में समा गई. शेष तीन बहने ऊपरी क्षेत्र की ओर आईं. तीन बहनों में से एक कचेड़ी में प्रतिष्ठित हुई. दो बहने सतलुज की ओर उतरीं. यहां से एक देवी श्राईकोटी जाकर प्रतिष्ठित हुई. अन्य एक बहन खेगसू में स्थित हुई.
एक अन्य लोकश्रुत परम्परा के अनुसार लाठी का शिर्कोटू ब्राह्मण एक बार तीर्थ यात्रा से लौट कर कचेड़ी मंदिर में पैर माता की ओर कर सोया. माता के कोप से ब्राह्मण का सिर माता की ओर हो गया. हठात ब्राह्मण ने  पुन: पैर माता की मूर्ति की ओर कर सोने का प्रयास किया. परन्तु माता के प्रताप से सिर मूर्ति की ओर हो जाता. थक हार कर शाबर विद्या के निष्णात शिर्कोटू ब्राह्मण ने अन्य बहनों सहित माता कचेड़ी को तुम्बी में बंद कर दिया. जब ब्राह्मण डिगाधार में रूका तो अवसर पाकर मातृकायें तुम्बी से निकलकर अलग अलग स्थानों पर स्थापित हुईं. एक देवी लाठी से ऊपर लठाड़ी, एक देवी हाटू ,एक देवी सराहन बुशैहर, एक कचेड़ी , एक शक्ति देरठू ,एक डिगाधार, एक माता खेगसू व एक माता श्राईकोटी में प्रतिष्ठित हुईं.
एक अन्य आख्यान जो आदि शक्ति कचेड़ी के  प्राकट्य से जुड़ा है कि जब मवाना ने टिक्कर के क्षेत्र में एक स्थान पर खुदाई की तो एक प्रस्तर पिंडी मिली. अगले दिन मवाना ने देखा कि पिंडी में जमीन से अतिरिक्त उभार आया है. मवाना ने पिंडी को  मिट्टी से दबाना चाहा. परन्तु अगले दिन पुन: पिंडी उभरकर बाहर आ जाती. इस चमत्कार के क्रम में माता ने घमाना के रामचाईक परिवार के व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मेरी पिंडी अमुक स्थान पर है. माता के आदेशानुसार रामचाईक परिवार के स्वप्नद्रष्टा व्यक्ति ने जब पिंडी को खोदकर निकाला तो माता का विग्रह भी निकला. व्यक्ति माता के विग्रह को घर लाकर पूजने लगा. कालांतर में माता के विग्रह को मंदिर में स्थापित किया गया.
उपरोक्त सभी लोकाख्यान से यह निश्चित है कि माता कचे़ड़ी विरानगर हाटकोटी से आकर अन्य बहनों सहित हिमालय के मध्योत्तर खण्ड में प्रतिष्ठित हुई. माता नि:संदेह महालक्ष्मी रूपा है. पौराणिक परम्परा में महालक्ष्मी महादेव की बहन है. कुमारसैन की रियासत के प्रथम राणा कीर्ति सिंह ने माता कचे़ड़ी को महादेव की बहन माना और  उसने कचेड़ी में भगवती का मंदिर भी बनवाया. रियासती काल में राणा के परिवार के बच्चों के केश काटने व लड़कियों के नाक-कान में में छेद  करने का अनुष्ठान माता कचेड़ी के मातृ देवरी में हुआ करता था. गद्दी पर आसीन होने पर नया राणा अपने परिवार सहित कचेड़ी माता के मंदिर में ज्वाला जातरा समारोह में शामिल होता  था. प्रत्येक तीसरे वर्ष माता को मातृ देऊरा में भैसे की बलि देने की परम्परा रही है. लोक मत है कि माता का मंदिर भले ही कचेड़ी में है. परन्तु वह सदैव अपने भाई महादेव कोटेश्वर के साथ मढोली में रहती है. बैनू और भुरी माता के दो सेवक हैं. बैनू बाहरी सराज के बैहना से आया है जबकि भुरी हालटा के जो बाग से आई है.
माता के सम्मान में माघ महीने में बल्टी अनुष्ठान आयोजित होता है. रात्रि भर जागरण के साथ लोक गायन जत्ती-आंचली का क्रम चलता है. दिवाली का पारम्परिक आयोजन कचेड़ी माता मंदिर में होता है. माता का प्राकट्य गूर में मध्य रात्रि को होता है. ब्रह्म बेला में माता का श्रृंगार होता है और वह मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करती है. माता की पूजा नामक अनुष्ठान चार वर्ष बाद होता है. इस अवसर पर शिखा पूजन का विधान है. भगवती के भाई महादेव की छड़ी भी इस उत्सव में पहुंचती है. यह पूजा कोटेश्वर महादेव की चार रथी यात्रा के पश्चात् मनाई जाती है. एक निश्चित स्थान पर महादेव व माता का भव्य मिलन होता है. माता कचेड़ी सावन महीने में घमाना के रामचाईक परिवार के घर रात्रि प्रवास पर रहती  है. माघ,दिवाली,मार्गशीर्ष व वैसाख की संक्रांतियां मुख्य मानी जाती हैं .माता केवल दिवाली और बल्टी में ही रथ में बैठ अपने क्षेत्र में भ्रमण करती है. माता केवल रात्रि में ही रथारूढ़ होकर बाहर निकलती है.
आदि शक्ति कचेड़ी कुमारसैन क्षेत्र  की प्रमुख देवी है जो यहां के  सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन के केन्द्र में स्थित है. युगों से हिमालय के इस एकांत और सुरम्य स्थल में विराजमान देवी अपने भक्तों के दुख व संताप का तुरन्त हरण कर लेती है.
या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थित:
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

इतिहासकार व साहित्यकार व प्राचार्य राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नारकण्डा (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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