दलितों के मसीहा डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था- शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वह दहाड़ेगा

राजकुमार रामलखन यादव, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

              “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वह दहाड़ेगा” शिक्षा समाज के परिवर्तन के लिए एक प्रभावी हथियार है। शिक्षा लोगों को उनके कर्तव्यों और अधिकारों के साथ शिक्षित करती है। प्राथमिक शिक्षा सभी शिक्षा की नींव है, इसलिए शिक्षा बहुत उच्च गुणवत्ता की होनी चाहिए। यह किसी साधारण व्यक्ति से विचार नहीं, बल्कि 20 वीं शताब्दी से श्रेष्ठ चितंक, ओजस्वी लेखक, यशस्वी वक्ता, स्वतंत्रता भारत के प्रथम कानून मंत्री तथा भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माण कर्ता एवं दलितों के मसीहा डॉ. भीमराव आंबेडकर के थे।
         डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्यप्रदेश के महू नामक शहर में  हुआ था। उनके पिता रामजी सेना में सूबेदार मेजर थे। उनकी माता का नाम भीमाबाई था। वे धार्मिक प्रवृत्ति की घरेलू महिला थी। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उनका अवतरण तब हुआ, जब धरती पर जाती-पाती, छूत-अछूत, ऊँच-नीच आदि विभिन्न समाजिक कुरीतियों का बोलबाला चरम सीमा पर था। देश मनुवादी व्यवस्था के बीच समाज में ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में विभाजित था। अछूतों को तालाब, कुओं, मंदिरों, शैक्षणिक संस्थाओं आदि सभी जगहों पर जाने से एकदम वंचित कर दिया गया था।
         अत्यंत कुटिल व  मानवता को शर्मसार कर देने वाली परिस्थितियों के बीच दलितों, पिछडों और पीड़ितों के मुक्ति दाता एवं मसीहा के रुप में डॉ. आंबेडकर अवतरित हुए। डॉ. आंबेडकर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। अपमान, तिरस्कार तथा घृणा के कड़वे घूंट पीते हुए उन्होंने एमए, पीएचडी, एमएससी, डीएससी, एलएलडी  लिट जैसी शिक्षा क्षेत्र में उत्तम उपाधियाँ प्राप्त करके अदम्य साहस, लगन, निष्ठा, धैर्य और शिक्षा के प्रति  गहनतम लगाव का परिचय दिया। उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में शोध कार्य भी किए थे। डॉ. अम्बेडकर देश के निर्धन और वंचित  समाज को प्रगति करने का जो सुनहरा सूत्र दिया था, उसकी पहली इकाई शिक्षा ही थी। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि वे गतिशील समाज के लिए शिक्षा को कितना महत्व देते थे। उनका त्रिसूत्र था शिक्षा, संगठन और संघर्ष। वे आहवान करते थे, शिक्षित करो, संगठित करो और संघर्ष करो तथा पढ़ो और पढ़ाओ। कमजोर वर्गो के छात्रों को छात्रावासों, रात्रि स्कूलों, ग्रंथालयों तथा शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से अपने दलित वर्ग शिक्षा समाज के जरिए अध्यन करने और साथ ही साथ आय अर्जित करने के लिए उनको सक्षम बनाया |
          27 दिसंबर 1927 को आंबेडकर ने एक सभा में न्यायालयों, पुलिस सेवा और व्यापार के दरवाजों को दलितों के लिए खोलने की मांग की थी। इस तरह 1930 में उन्होंने 30 हजार दलितों को साथ लेकर नासिक के कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया था। 1935 आंबेडकर ने लेबर पार्टी का गठन किया था, जिसने उस समय के चुनाव में विजय हासिल की थी।
1942 में वे वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य नियुक्त किए गए। सन् 1945 में उन्होंने (पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी) के जरिए मुंबई में सिद्धार्थ महाविद्यालय, औरंगाबाद में मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना की थी। बौद्धिक वैज्ञानिक प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृत वाले बौद्ध धर्म की 14 अक्टूबर 1956 को 5 लाख लोगों के साथ नागपुर में दीक्षा ली तथा भारतीयों में बौद्ध धर्म को पुनः स्थापित कर अंतिम ग्रंथ द बुद्ध एंड हिज धम्मा के द्वार निरंतर बुद्ध का मार्ग प्रशस्त किया था। बेजबान, शोषित और अशिक्षित लोगों को जगाने के लिए सन 1927 से 1956 के दौरान मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत नामक पाच साप्ताहिक एवं पाक्षिक पत्र पत्रिकाओं का  संपादन किया। भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित शोध ग्रंथ रुपए की समस्या उसका उद्भव तथा उपाय और भारतीय चलन वह बैंकिंग का इतिहास ग्रंथों और हिल्टर यंग कमिशन के समक्ष उनकी  साक्ष्य के आधार पर 1935 में हुई थी।
         वायसराय की कौंसिल में श्रममंत्री की हैसियत से श्रम कल्याण के लिए श्रमिकों की 12 घंटे से  घटाकर 8 घंटे कार्य समय, समान कार्य, समान वेतन, प्रस्तुत अवकाश  सवैधानिक अवकाश कर्मचारी राज्य बीमा योजना, स्वास्थ्य सुरक्षा कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952 में बनाया था। डॉ. आंबेडकर ने समता, समानता, बंधुता एवं मान्यता आधारित भारतीय संविधान को 2 वर्ष 11 महीने और 17 दिन के कठिन परिश्रम से तैयारी कर 26 नवंबर 1949 को तत्कालीन राष्ट्रीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपकर देश के समस्त नागरिकों को राष्ट्रीय एकता अखंडता और व्यक्ति की गरिमा की जीवन पद्धति से भारतीय संस्कृति को अभिभूत किया था। यह संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ लिखित संविधान माना जाता है। दलितों, श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करते हुए देश का महा मानव 6 दिसंबर 1956 को सदा सदा के लिए चीर निंद्रा में भारत माता की गोद में सो गया। इस दिन को बौद्ध धर्म के अनुयायी महापरि निर्वाण दिवस के रुप में मनाते हैं। 1990 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था।
ठाणे मनपा महापौर पुरस्कृत शिक्षक

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