हिमाचल के इतिहास पर डा. हिमेन्द्र बाली की शोधपरक पुस्तक है “हिमालय गौरव: हिमाचल प्रदेश”

सुरभि बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय में स्थित ऐसा पर्वतीय राज्य है, जो राष्ट्रीय विकास सूचकांक में सारे देश में अग्रणी राज्यों की पांत में शामिल है। नगाधिपति हिमालय के अंचल में स्थित हिमाचल का प्राकृतिक सौंदर्य अतुलनीय है। यहां के हिमाच्छादित पर्वत, सुरम्य स्थालाकृति और सदानीरा नदियों का कर्णप्रिय निनाद चिताकर्षक है। हिमाचल प्रदेश हिमालय के आगोश में पलता वह क्षेत्र है, जहां आदि मानव का उद्भव हुआ था। डा. हिमेन्द्र बाली पिछले तीन दशकों से हिमाचल की संस्कृति व इतिहास पर निरन्तर शोध कार्य साधना में रत हैं। इनकी एशिया प्रेस बुक्स कलकत्ता से दिसम्बर 2020 में प्रकाशित “हिमालय गौरव:हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश” शोधात्मक पुस्तक है, जो कम पृष्ठों में प्रमाणिक व जमीनी सूचना प्रदान करती है। डा. बाली की यह पुस्तक इनके तीस वर्षों के शोधात्मक लेखों पर आघारित है, जिसमें प्रदेश की ऐसी जानकारी अंतर्निहित है, जो अन्य पुस्तकों में सम्भव नहीं है।
पुस्तक का पहला अध्याय हिमाचल की भौगोलिक स्थिति पर आधारित है। इस अध्याय में हिमाचल के भूगोल पर नवीनतम् जानकारी दी गई है। प्रदेश की प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं  के अतिरिक्त छोटी पर्वत मालाओं का वर्णन और पर्वतों से जुड़ी किंवदंतियों का रोचक वर्णन पाठकों के ज्ञानवर्द्धन के लिए पर्याप्त है। हिमाचल में पर्वतों व पहाड़ों को देवतुल्य पुज्य मान कर पूजा की सहस्राब्दियों पुरानी परम्परा रही है। यहां के सांस्कृतिक जीवक में पर्वत पूजा अभिन्न धार्मिक अनुष्ठान है। पुस्तक में किन्नर कैलाश, मणिमहेश कैलाश, श्रीखण्ड व चूड़चांदनी आदि पर्वतों की धार्मिक मान्यताओं व आस्था का रोचक वर्णन जिज्ञासुओं को सहजग्राह्य सूचना सहज ही सम्प्रेषित करता है। पुस्तक में यहां की वैदिक नदियों-शतद्रु, अर्जिकीया, पुरूषणी, असिकनी व यमुना से जुड़े वैदिक व पौराणिक आख्यान का विशद वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त हिमालय पुत्री इन नदियों को हिमाचल में गंगा की तरह पावन व मोक्षदायी माना जाता है। इन नदियों से प्रदेश के जनमानस की जुड़ी आस्था और मान्यता का विशद वर्णन पुस्तक में सन्निहित है, जो अन्यत्र सम्भव नहीं है। वैदिक नदियों के अतिरिक्त छोटी सरिताओं व खड्डों का भी जनमानस में पुज्य पद प्राप्त है। इन जलधाराओं से जुड़े विश्वास और परम्परायें भी पुस्तक में विस्तृत जानकारी के लिए उपलब्ध है।
हिमाचल के जलप्रपात व झीलें भी किसी देवी-देवता, नाग देवता व सिद्ध पुरूष के चमत्कार से सम्बंधित है। पुस्तक में झीलों और जल प्रपातों से जुड़ी परम्पराओं का वर्णन विषय को रोचक बना देता है। कांगड़ा की भागसु नाग झील, मण्डी की रिवालसर झील, मण्डी की कमरूनाग झील, कुल्लू की सरेओल सर झील, चम्बा की खजियार झील और शिमला की तानीजुब्बल झील आदि झीलें देव आस्था के पवित्र स्थल हैं। इन झीलों से जुड़े देवाख्यान रोचक और देव-संस्कृति के संवर्द्धन के लिए स्रोतस्वरूप हैं। यहां के जलप्रपात भी देवस्वरूप और योगिनियों से जुड़े पावन धाम हैं। इनके विषय में बहुमूल्य सूचनाएं पुस्तक में उद्धृत कर पुस्तक को संग्रहणीय बना देतीं है।
पुस्तक में प्रदेश की सुन्दर व उपजाऊ घाटियों का वर्णन किया गया है। मण्डी की बल्ह और करसोग घाटी, कांगड़ा की कांगड़ा घाटी, सोलन की कुनिहार घाटी, किन्नौर की सागला घाटी व सिरमौर की क्यारदा घाटियों की विशेषताओं का वर्णन है। भौगोलिक स्थिति में यहां की प्राकृतिक सम्पदा, गर्म जल स्रोत, वन्य जीवों, वन सम्पदा और खनिज सम्पदा का अद्यतन वर्णन कर पुस्तक को परीक्षार्थियों व पाठकों के लिए संग्रहणीय बनाया गया है। अध्याय के अंत में प्रत्येक सूचना संदर्भ द्वारा परिपुष्ट किया गया है, ताकि संदर्भ देकर पाठकों को मिलने वाली सूचना को प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा जा सके। अन्य अध्याय में हिमाचल के इतिहास का विशद वर्णन किया गया है। दूसरे अध्याय में हिमाचल में आदि मानव की उत्पत्ति के पुरातात्विक स्रोतों व स्थानों का सटीक और प्रमाणिक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। वास्तव में  वैदिक और पौराणिक साहित्य में सृष्टि का उद्भव हिमाचल में हिमालय के ऊंचे पर्वत पर हुआ था, जहां ऊंचे श्रृंग पर मनु ने सप्तऋषि सहित नाव को  जल प्लावन के बाद बांधा था। इस अध्याय में हिमाचल के प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक के शोधात्मक इतिहास का वर्णन है। ऋग्वैदिक, रामायण, महाभारत, बौद्ध, मौर्य, कुषाण, गुप्त, हर्ष, राजपूत, सल्तनत, मुगल एवम् ब्रिटिशकाल में हिमाचल प्रदेश पर पड़े प्रभावों सजीव चित्रण किया गया है। तीसरे अध्याय में कटोच वंशज महाराजा संसारचंद के पहाड़ी राजाओं के साथ सम्बंधों का वर्णन है। संसारचंद के चम्बा, सिरमौर, कुटलैहड़, मण्डी, सुकेत, बिलासपुर, नूरपुर व हिन्डूर आदि रियासतों के साथ सम्बंधों को क्रमिक रूप में रोचक ढंग से निरूपित किया गया है। चौथे अध्याय में 1804 से 1815 तक आक्रमणों व तत्सम्बन्धी प्रभावों का वर्णन है। नि:संदेह महाराजा संसारचंद की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं के कदमों को गोरखों ने रोका था। गोरखों के हाथों  1806 में महल मोरियां के स्थान पर  संसारचंद की पराजय ने कांगडा के ऐतिहासिक दुर्ग पर गोरखों का आधिपत्य स्थापित कर दिया था। कटोच वंशज संसार चंद द्वारा कांगडा़ किला खोने के बाद गोरखों ने कांगडा़ को जी खोल कर लूटा था। इतिहास गवाह है कि गोरखों द्वारा कांगडा़ पर अधिकार के बाद कांगडा़ की गलियों में घास उग आई थी और बाघिनें गलियों में बच्चे देने लगी थी।
अगामी अध्याय में 1857 से 1919 तक हिमाचल की ब्रिटिश सरकार और रियासती शासन की शोषणकारी नीतियों के विरूद्ध संघर्ष का विवरण है। स्वतंत्रता के प्रथम संघर्ष की ज्वालायें हिमाचल में भी भड़क उठीं थीं। हिमाचल की जतोग, सबाथू और कसौली सैनिक छावनियों में सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। जनता ने भगावत के स्वर को मुखर किया था। रामपुर बुशैहर के एकमात्र पहाड़ी राजा ने अंग्रेजों की खुले आम मुखालपत की थी, कई वीर पहाड़ी लोगों के लोक गीत व गाथायें आज भी जनमानस की जुबां पर जिंदा हैं, जिन्होने नृशंस ब्रिटिश सरकार और शोषणकारी राजाओं व राणाओं के विरूद्ध प्रतिरोध के स्वर को बुलंद किया था। नि:संदेह 1857 के बाद कई जनान्दोलन रियासतों में अनुचित कर उगाही, नौकरी में भाई-भतीजावाद और बेगार के विरूद्ध भड़क उठे थे।
सांतवां अध्याय सुकेत सत्याग्रह को समर्पित है। सुकेत सत्याग्रह रजवाडा़शाही के विरूद्ध पहला संगठित प्रजामण्डल का आंदोलन था। जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य से दासता की बेड़ियों से आजाद हो चुका था तो हिमाचल के कांगड़ा हिल स्टेट्स की चार रियासतें और शिमला हिल स्टेट्स की 26 रियासतों की प्रजा अब भी राजतंत्रीय दासता के दमन चक्र में फंसी थीं। हिमालयन हिल स्टेट्स सब रीजनल कौंसिल के नेतृत्व में 18 फरवरी 1948 को प्रजामण्डल नेता पण्डित पदम देव के नेतृत्व में हजारों सत्याग्रहियों नें तत्तापानी और फिरनू की चौकियों पर धावा बोलकर सत्याग्रह का का आगाज किया था। इसी दिन सत्याग्रही हजारों की तादाद में शाम को करसोग पहुंचे थे। करसोग की सारी चौकियों पर सत्याग्रहियों ने अधिकार कर लिया था। रात्रि पर्यंत देशभक्ति के गीतों से पूरा क्षेत्र झूम उठा था। अगले दिन सत्याग्रही सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा पहुंचे थे, जहां लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया था। वर्षा के कारण सत्याग्रही तीन दिन पांगणा में ही रहे थे। 22 फरवरी को सत्याग्रही सुकेत की राजधानी सुन्दरनगर की ओर कूच कर गए थे। रास्ते की चौकियां सत्याग्रहियों के अधिकार में आती गईं। 25 फरवरी को सत्याग्रहियों ने राजधानी पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार लोकतंत्र की ओर उठा संघर्ष का यह कदम सफलता के मुकाम तक जा पहुंचा था। सुकेत सत्याग्रह से प्रेरित होकर अन्य रियासतों में भी लोकतंत्र के लिए संघर्ष हुए, अंतत: सत्याग्रहियों के त्याग और बलिदान से 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश का जन्म हुआ था।
अंतिम अध्याय हिमाचल में प्रजामंडल आंदोलन की घटनाओं के निरूपण के लिए समर्पित है। हिमाचल में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में रियासतों में जन आदोलन को सक्रिय करने के लिए प्रजामंडल संगठनों का उदय हुआ था। इन संगठनों ने रियासतों में लोकतंत्रीय शासन को लाने और मनमाने कानूनों को हटाने की आवाज बुलंद की थी। अंतत: प्रजामंडल आंदोलन का ही परिणाम था कि हिमाचल की जनता रियासती दासता के कुचक्र से मुक्त हुई थी। हिमालय गौरव: हिमाचल प्रदेश पुस्तक में लेखक के पिछले तीस वर्षों के शोधपत्रों का संकलन है। पुस्तक में हिमाचल के भूगोल और इतिहास की जानकारी सटीक और सारगर्भित है। एक सौ उन्नीस पृष्ठीय इस पुस्तक में शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों व पाठकों के लिए नवीनतम् और सतही जानकारी उपलब्ध है। पुस्तक में उपरोक्त विषयों की तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध है, अत: पाठकों कों किसी अन्य पुस्तक पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। पुस्तक का कलेवर हार्ड बांईडिंग के कारण आकर्षक है। पुस्तक का मूल्य मात्र 250 रूपये है। बहुपयोगी यह पुस्तक अमेजोन पर भी उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त यह पुस्तक बुक स्टाल पर भी उपलब्ध है। शोध की दृष्टि से लिखी यह पुस्तक डा. हिमेन्द्र बाली की इतिहास और साहित्यिक साधना का प्रतिफल है, जिसे पाठक हाथों-हाथ खरीदना चाहेंगे।

प्रधानाचार्य व खण्ड प्रयोजना अधिकारी, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

Related posts

Leave a Comment