शिवपुराण से……. (284) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

कामदेव के नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र-वसिष्ठ मुनि का चन्द्रभाग पर्वत पर उसका तपस्या की विधि बताना……………….

गतांक से आगे………..

मेरे पुत्र मरीचि आदि द्विजों ने उस पुरूष के नाम निश्चित करके उससे यह युक्तियुक्त बात कही।
ऋषि बोले- तुम जन्म लेते ही हमारे मन को भी मथने लगे हो। इसलिए लोक में मन्मथ नाम से विख्यात् होओगे। मनोभव! तीनों लोकों में तुम इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हो, तुम्हारे समान सुन्दर दूसरा कोई नहीं है, अतः कामरूप होने के कारण तुम काम नाम से भी विख्यात् होओ। लोगों को मदमत्त बना देने के कारण तुम्हारा एक नाम मदन होगा। तुम बड़े दर्प से उत्पन्न हुए हो, इसलिए दर्पक कहलाओगे और सदर्प होने के कारण ही जगत् मे कदर्प नाम से भी तुम्हारी ख्याति होगी। समस्त देवताओं का सम्मिलित बल-पराक्रम भी तुम्हारे समान नहीं होगा। अतः सभी स्थानों पर तुम्हारा अधिकार होगा और तुम सर्वव्यापी होओगे। जो आदि प्रजापति है, वे ही ये पुरूषों में श्रेष्ठ दक्ष तुम्हारी इच्छा के अनुरूप पत्नी स्वयं देंगे। वह तुम्हारी कामिनी (तुमसे अनुराग रखने वाली) होगी।
ब्रह्माजी ने कहा-मुने! तदनन्तर मैं वहां से अदृश्य हो गया। इसके बाद दक्ष मेरी बात का स्मरण करके कंदर्प से बोले-

(शेष आगामी अंक में)

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