साक्षी सागर

वाणी बरठाकुर ‘विभा’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

दूर देखो एक बार
धुंधले क्षितिज पर
मिलन नभ – समन्दर
बह रहा धीर सागर ।
आज शांत बह रहा है
सब कुछ अंतर्मन में लेकर
आदि काल से अबतक
इतिहास का साक्षी बनकर ।
भू भाग के उतार-चढ़ाव
बदले भूकम्प के कारण
कहीं पर्वत, कही क्षीरसागर
सबका वो साक्षी रहा।
यायावरी जीवन से
आदिमानव बने मानव
कृषि और घर बसाने लगे
सबका सागर साक्षी बना।
पुर्तगाल ….अंग्रेज़ आए
हृदय चीरकर सागर का
 नव आविष्कार लिए
बस गए सागर के तीर पर
किए नित दिन व्यापार
कितने मशीनों का बोझ उठाया
साक्षी है आज भी सागर ।
सीमा पर लड़ा कितनों ने
बहाकर लहू सागर में
देश की खातिर कितनों ने
कर दिया प्राण न्योछावर
क्षितिज साक्षी है आज भी
कितने फांसी पर लटक गए !
बदलाव जीवन की रीत है
आदिम से आधुनिक बने
मानवता का पाठ भूल गए
कूड़ा – कचरा सबकुछ
सागर तट पर फेंक गए
विष सागर में बहाकर
खुद का अनिष्ट कर गए
देखकर मानव की करतूतें
सागर  निस्तब्ध रह गया
कितनों के पाप धोए जाएँ !
तुझे देखकर आज मेरा
अंतर्मन भी  रो पड़ा
शर्मिंदा हूँ मानव के कर्म पर
कितना कुछ तू सह रहा
दंग होकर वहीं रही मूर्तिवत ।
तल गेरेकी, तेजपुर (शोणितपुर) असम

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