नींव के सेनानी

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

नींव में गडे हुये ईंटो को
कौन जहाँ में रोता है
कौन खाद की उन्नत फसलें
खेतों में कभी बोता है।
महल तन गया कंगूरों में
रंग आ गया रोगन भी
नींवों से ईंटों ने झांकी
कितने हैं मजबूर सभी।
आज महल की सभागार में
हर एक क्षणों का सम्मोहन
देख रहे खुश प्रबल सभी
प्रत्येक कणों का आकर्षण।
भव्य सजावट इतराती
झालर संग मोती गाती
सभ्य सभा में नृत्य मनोरम
छुपकर आंखों को भाती।
सभी मग्न हो चित्र निरंतर
खींच रहे थे बढचढ कर
सुन्दरता को देख कई पग
ढिढक-ढिढक व चल-चलकर।
व्यंजन की इतनी प्रकार थी
देख पेट हीं भर जाते
खाने के पहले हीं कुछ मुख
भक्तिमय वंदन गाते।
चली निरंतर सभा रातभर
चले सभी के चंचल पग
सभा खत्म पर बचे हुये थे
गंदे बर्तन बस तितर वितर।
कुत्ते दूर-दूर से भ्रमणित
कुछ गरीब भी थे विचलित
काश!सभा में नहीं हमें?
जूठे पत्तल हीं हो वितरित।
रंज और खुशी के बीच
समय वीर अब उठ आया
झालर बत्ती बुते सभी जब
कुत्तों को भी कुछ भाया।
अब अफसोस धरा के अंदर
दबे हुये उन वीरों का
जिनकी कुर्बानी का थोडा
स्मरण नहीं किसी को था।
यदि नींव के ईंटो को भायेगा?
कंगूरों का इठलाना हीं
महल नहीं फिर बन पायेगा
रह जायेगा इतराना हीं।
परहित में कुछ तत्व कणों को
अदृश्य यहाँ रहना पडता है
और समय के सबल क्षणों को
बिन इच्छा गहना पडता है।
कहाँ नींव कभी हंसते गाते
कंगूरे अक्सर रोते हैं
सुन्दरता और कुरुपता संग
आंखों की अभिलाषा ढोते हैं।।
ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश

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