होली का निठल्ला चिन्तन

 कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

मौसम सुहावना और मतवाला चल रहा है, सो लोगों ने करोना डरोना के बावजूद जम के होली खेली। होली के फाग के रंग में हर उम्र के सभी सरोबर हो गये, लेकिन उत्साह जवानी में ज्यादा होना स्वाभाविक है। जवानों की टोलियाँ मय ढोल नगाडो़ के गली-गली, नगर-नगर होली है! के नारे के साथ शराब और भांग के तरन्नुम में ऋतुराज के आगमन का लुत्फ उठाने से नहीं चूके। कई जगह गिरे, पिटे और बेइज्जत भी हुए, लेकिन बहादुरों ने हिम्मत नहीं हारी, इसमें सठिया और बगैर दाँत वाले भी अपने अपने अन्दाज में गुलाल तिलक लगाकर और गुजियां खाकर अपनी और उनकी जवानी की याद में लार टपकाते नज़र आये।
बेरोजगार देश में नौजवानों का यह जोश देखकर हमें लगा कि इस भरपूर युवा शक्ति को अपनी प्रतिभा की बिल्कुल पहचान नहीं है। यह सब सिर्फ सरकारों के सहारे और भरोसे नौकरी माँग-माँग कर बूढ़े हो रहे हैं, लेकिन इन असंगठित पगलों को अपनी ताकत का जरा सा भी गुमान नहीं हैं। देश में अब रोज-रोज होने वाले सड़क जाम और धरना-प्रदशनों में ये ठलुआ-बेरोजगार अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर अपनी पर्मानेन्ट आमदनी सुनिश्चित कर सकते हैं। देश-विदेश से आने वाला तमाम चन्दा अन्य इमदाद आपकी आत्मसम्मान पूर्वक कमाई का रास्ता खोल सकते हैं। देश में सत्ता पक्ष, सरकार बचाने और विपक्ष ,सरकार गिराने अस्थिर करने के लिए इन्हें मुँह मांगी फीस अदा करेंगे। इसके अलावा भी तमाम चुनावों, जीवन के अन्य कई आयोजनों में भीड़ की बहुत जरूरत पड़ती रहती है, वहाँ भी बेरोजगारों के लिए बहुत अवसर हैं। मात्र सरकारी नौकरी के सपनों से बूढ़े हो रहे जवाँ बेरोजगारों! जागो! देखो! दिल्ली के आसपास सरकार घेरने के आयोजन से कुछ सीखो, कैसे ठलुए दोनों हाथ लड्डू खा रहें हैं।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ 

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