मैं भी कान्हा सा बन पाऊं

डॉ. अ कीर्ति वर्द्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

महाराज बाहर दरवाजे पर, एक निर्धन ब्राह्मण आया है,
न सिर पर उसके टोपी है, बिन टीका चंदन के आया है।
है रक्त बह रहा पांवों से, और फटी एड़ियां उसकी है,
जीर्ण-शीर्ण सी काया उसकी, फटे वस्त्रों में धाया है।
कहता खुद को बालसखा, संदीपनी आश्रम की बातें,
बगल पोटली छोटी सी, वह आंखों में अश्रु लाया है।
कमर पेट मिल एक हुये हैं, झुकी झुकी उसकी काया,
नाम सुदामा है उसका, दर्शन अभिलाषी बतलाया है।
सुनते ही कान्हा दौड़ पड़े, नहीं तन मन की सुध रही,
सभी रानियां महारानी, व्याकुल हो दृश्य देख रही।
दौड़ पड़े सब पीछे पीछे, ऐसी क्या मुश्किल आन पड़ी,
यह कौन अनोखा जीव खड़ा, आंखें भौचक्की देख रही।
जिसके कारण कान्हा ने, सुध बुध अपनी बिसरा दी,
अस्त व्यस्त वस्त्र हुये सब, दास दासियां देख रही।
जाते ही कान्हा ने ब्राह्मण को, निज अंक में समेट लिया,
अश्रु बहते कान्हा के, विभोर हुये रूक्मिणी देख रही।
कान्हा ने तब धरती पर, अपना अंग वस्त्र बिछा दिया,
सुदामा को उस पर ले चलते, नगरी सारी देख रही।
महलों में लाकर ब्राह्मण को, निज आसन पर बैठाया,
अश्रु से पांव पखारन लगे, यह सारी सृष्टि देख रही।
मिले सखा जो कान्हा सा, बलिहारी जाऊं उस पर,
मैं भी कान्हा सा बन पाऊं, ‘कीर्ति’ बुद्धि सपना देख रही।
मुज़फ्फरनगर उत्तर प्रदेश 

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